फ्रीडम हाउस ने अंतरराष्ट्रीय स्तर बताया – भारत अब आज़ाद देश नहीं रहा, आंशिक आज़ाद बचा है – विवाद तेज , भारत सरकार ने यह रखा अपना पक्ष , जानें ख़ास

“India Is No More Free” 
Freedom House told international level – India is no longer a free country, partial
independence has been left – controversy intensified, Government of India kept its side, know special
 अमेरिका की “फ्रीडम हाउस” ने जो 1941 से लोकतंत्र, राजनैतिक स्वाधीनता और मानवाधिकार पर रिसर्च करता है “फ्रीडम हाउस” की पूरे विश्व मे बहुत बड़ी इज्जत है ने वैश्विक स्तर पर सर्व के आधार पर बताया हैं कि भारत अब आज़ाद देश नहीं रहा, आंशिक आज़ाद बचा है।
 “फ्रीडम हाउस” ने भारत को “फ्री” देशो की सूची से हटा कर “Partially Free” यानी “आंशिक स्वाधीन” देशो की सूची में डाल दिया है |
1. मोदी और BJP त्रासदीपूर्ण तरीके से भारत को तानाशाही की ओर ले जा रहे है मोदी के नेतृत्व में भारत ‘लोकतंत्र का प्रहरी” बनने की राह को बन्द कर चूका है |
2. Free से Partially Free के कारण  – मुसलमान, मीडिया, बुद्धिजीवी, सिविल सोसाइटी और आंदोलनकारियों पर प्लानिंग के तहत आक्रमण |
3. कुछ खतरनाक ट्रेंड : देशद्रोह के कानून का गलत प्रयोग, NGO पर रोक, विरोधियों पर एजेंसीओ की रेड, एक रिटायर्ड चीफ जस्टिस को राज्यसभा में भेजना |
4. भारत मे लोकतंत्र पर खतरा पूरे विश्व मे लोकतंत्र पर खतरे की घंटी है..लोकतांत्रिक स्पेस को भारत ने संकुचित किया है |
5. CAA/दिल्ली दंगे/अदालतों के फैसलों पर भी विस्तार से लिखा है..मोदी ने ‘लोकतंत्र की हत्या’ के काम मे जबरदस्त तेजी लाई है |
6. भारत के निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए गए है मोदी ने जिस ढंग से BJP के लिए पैसे जुटाए है वो भी भारत के लिए काफी खतरनाक माना गया है |
 अमेरिका के विदेश विभाग ने इस रिपोर्ट को मान्यता दी है..पूरे विश्व के निवेशक किसी भी निवेश के पहले सारे फैक्टर का विश्लेषण करते है..ऐसी रिपोर्ट “आर्थिक बैरियर” लगाने की पहली कड़ी है..बैरियर का अर्थ प्रतिबंध नही है |
स्वतंत्र देश के रूप में भारत के दर्जे में कमी से जुड़ी फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट का खंडन –

फ्रीडम हाउस की “डेमोक्रेसी अंडर सीज” शीर्षक वाली रिपोर्ट, जिसमें दावा किया गया है कि एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत का दर्जा घटकर “आंशिक रूप से स्वतंत्र” रह गया है, पूरी तरह भ्रामक, गलत और अनुचित है।

यह बात इस तथ्य से जाहिर होती है कि केन्द्र में मौजूद राजनीतिक दल से इतर दूसरे दल भारत के कई राज्यों में संघीय ढांचे के तहत एक चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से सत्ता में आए हैं। ये चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हुए थे, जिन्हें एक स्वतंत्र संस्था द्वारा कराया गया था। इससे एक जीवंत लोकतंत्र की उपस्थिति का पता चलता है, जो विभिन्न विचारों वालों को स्थान देता है।

इन विशेष बिंदुओं का खंडन किया जाता है :-

  1. भारत में मुसलमानों और उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के खिलाफ बनाई गई भेदभावपूर्ण नीति –  भारत सरकार अपने सभी नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार करती है, जैसा देश के संविधान में निहित है और बिना किसी भेदभाव के सभी कानून लागू हैं। आरोपी भड़काने वाले व्यक्ति की पहचान को ध्यान में रखे बिना, कानून व्यवस्था के मामलों में कानून की प्रक्रिया का पालन किया जाता है। जनवरी, 2019 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के विशेष उल्लेख के साथ, कानून प्रवर्तन मशीनरी ने निष्पक्ष और उचित तरीके से तत्परता से काम किया। हालात को नियंत्रित करने के लिए समानता के साथ और उचित कदम उठाए थे। प्राप्त हुई सभी शिकायतों/ कॉल्स पर कानून प्रवर्तन मशीनरी ने कानून और प्रक्रियाओं के तहत आवश्यक कानूनी और निरोधक कार्रवाई की थीं।
  2. देशद्रोह कानून का उपयोग – भारत के शासन के संघीय ढांचे के तहत ‘सरकारी आदेश’ और ‘पुलिस’ राज्य के विषय हैं। अपराधों की जांच, दर्ज करना और मुकदमा, जीवन और संपत्ति की रक्षा आदि सहित कानून व्यवस्था बनाये रखने का दायित्व मुख्य रूप से राज्य सरकारों के पास है। इसलिए, कानून प्रवर्तन प्राधिकरणों द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा के लिए सही कदम उठाए गए थे।

 

 

 

  1. लॉकडाउन के माध्यम से कोविड-19 पर सरकार की प्रतिक्रिया –16 मार्च से 23 मार्च के बीच ज्यादातर राज्य सरकारों/ संघ शासित क्षेत्रों ने कोविड-19 के आकलन के आधार पर अपने संबंधित राज्यों/ संघ शासित क्षेत्र में आंशिक या पूर्ण लॉकडाउन लगा दिया था। लोगों की किसी प्रकार की व्यापक आवाजाही से देश भर में तेजी से यह बीमारी फैल सकती थी। इन तथ्यों, वैश्विक अनुभव और रणनीति में तात्कालिकता की जरूरत व देश भर में विभिन्न रोकथाम के उपायों के कार्यान्वयन को ध्यान में रखते हुए, एक देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान कर दिया गया था। सरकार इस बात को लेकर पूरी तरह सतर्क थी कि लॉकडाउन के दौरान, लोगों को बेवजह संकट का सामना नहीं करना चाहिए। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने हालात से निपटने के लिए ये कदम उठाए; (1) भारत सरकार ने खाद्य पदार्थ, स्वास्थ्य, निराश्रितों और प्रवासी कामगारों को आश्रय उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकारों को राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) के इस्तेमाल की अनुमति दे दी (2) सरकार ने प्रवासी कामगारों को नियंत्रित क्षेत्रों के बाहर विभिन्न गतिविधियों से जोड़े जाने की अनुमति दे दी, जिससे उनके लिए आजीविका सुनिश्चित हुई (3) सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रुपये के एक राहत पैकेज की भी घोषणा की, जिसमें प्रवासी कामगारों को भी शामिल किया गया (4) सरकार ने अपने गांवों में लौट रहे प्रवासी कामगारों के लिए रोजगार और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देने के लिए एक अभियान लॉन्च किया (5) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के अंतर्गत नवंबर, 2020 तक लगभग 80 करोड़ लाभार्थियों को हर महीने मुफ्त में 5 किलोग्राम गेहूं या चावल, 1 किलोग्राम दाल उपलब्ध कराई गई (6) महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के अंतर्गत दैनिक मजदूरी बढ़ा दी गई, जिसमें वापस लौटने वाले प्रवासी कामगारों को भी शामिल किया गया। लॉकडाउन अवधि से सरकार को मास्क, वेंटिलेटर, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट आदि की उत्पादन क्षमता बढ़ाने और इससे प्रभावी रूप से महामारी के प्रसार को रोकने का मौका मिला। प्रति व्यक्ति आधार पर भारत में कोविड-19 के सक्रिय मामलों की संख्या और कोविड-19 से जुड़ी मौतों के मामले में वैश्विक स्तर पर सबसे कम दर में से एक रही।
  2. मानवाधिकार संगठनों पर सरकार की प्रतिक्रिया – भारतीय संविधान मानवाधिकारों की रक्षा के लिए मानवाधिकार सुरक्षा अधिनियम, 1993 सहित विभिन्न कानूनों के तहत पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराती है। यह अधिनियम मानवाधिकारों के बेहतर संरक्षण और इस विषय से जुड़े मसलों के लिए एक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोगों के गठन का प्रावधान करता है। राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश करते हैं और पूछताछ, जांच के एक तंत्र के रूप में काम करता है तथा ऐसे मामलों में सिफारिश करता है जहां उसे लगता है कि देश में मानवाधिकारों का उल्लंघन किया गया है।
  3. शिक्षाविदों और पत्रकारों को धमकी व मीडिया द्वारा व्यक्त असंतोष की अभिव्यक्ति पर अंकुश – भारतीय संविधान अनुच्छेद 19 के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए प्रावधान करता है। चर्चा, बहस और असंतोष भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा है। भारत सरकार पत्रकारों सहित देश के सभी नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च अहमियत देती है। भारत सरकार ने पत्रकारों की सुरक्षा पर राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों को विशेष परामर्श जारी करके उनसे मीडिया कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त कानून लागू करने का अनुरोध किया है।
  4. इंटरनेट शटडाउन –दूरसंचार अस्थायी सेवा निलंबन (लोक आपात और लोक सुरक्षा) नियम, 2017 के प्रावधानों के तहत इंटरनेट सहित दूरसंचार सेवाओं का अस्थायी निलंबन किया जाता है, जिसे भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 के अंतर्गत जारी किया गया है। इस अस्थायी निलंबन के लिए केन्द्र सरकार के मामले में गृह मंत्रालय में भारत सरकार के सचिव; या राज्य सरकार के मामले में गृह विभाग के प्रभारी सचिव की अनुमति की जरूरत होती है। इसके अलावा, ऐसे किसी आदेश की समीक्षा एक निश्चित समय अवधि के भीतर केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा, क्रमशः भारत सरकार के कैबिनेट सचिव या संबंधित राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बनी समीक्षा समिति द्वारा की जाती है। इस प्रकार, सख्त सुरक्षा उपायों के तहत कानून व्यवस्था बनाए रखने के व्यापक उद्देश से दूरसंचार/इंटरनेट सेवाओं के अस्थायी निलंबन का सहारा लिया जाता है।

 

 

 

 

  1. एफसीआरए संशोधन के तहत एमनेस्टी इंटरनेशनल की संपत्तियां जब्त किए जाने से रैंकिंग में आई गिरावट – एमनेस्टी इंटरनेशनल को एफसीआरए अधिनियम के तहत सिर्फ एक बार और वह भी 20 साल पहले (19 दिसंबर 2000) में अनुमति मिली थी। तब से एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा बार-बार आवेदन के बावजूद बाद की सरकारों ने एफसीआरए स्वीकृति देने से इनकार कर दिया, क्योंकि कानून के तहत वह ऐसी स्वीकृति हासिल करने के लिए पात्र नहीं थी। हालांकि, एफसीआरए नियमों को दरकिनार करते हुए एमनेस्टी यू. के. भारत में पंजीकृत चार इकाइयों से बड़ी मात्रा में धनराशि ले चुकी है और इसका वर्गीकरण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के रूप में किया गया। इसके अलावा एमनेस्टी को एफसीआरए के अंतर्गत एमएचए की मंजूरी के बिना बड़ी मात्रा में विदेशी धन प्रेषित किया गया। दुर्भावना से गलत रूट से धन लेकर कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया गया।एमनेस्टी के इन अवैध कार्यों के चलते पिछली सरकार ने भी विदेश से धन प्राप्त करने के लिए उसके द्वारा बार-बार किए गए आवेदनों को खारिज कर दिया था। इस कारण पहले भी एमनेस्टी के भारतीय परिचालन को निलंबित कर दिया गया था।

खाप पंचायतों के फैसले से हिल गयी जुमले वाली सरकार

पिछले 2 महीने से ज्यादा का समय बित चुका है और दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन की गूंज अब धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय हलकों में सुनाई देने लगी है। दो महीनों के दौरान आंदोलन कृषि कानूनों के खिलाफ कई रंग ले चुका है और इसी वजह से जुमले वाली सरकार की नींद उड़ गयी है। गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा ने आंदोलनकारियों के लिए परेशानी खड़ी कर दी थी लेकिन इसके बाद जिस तहर टिकैत ने किसानों के लिए मरने की बात कही उसको लेकर किसानों में जबरदस्त जोश देखने को मिल रहा है।

दिल्ली हिंसा को लेकर टिकैत ने सार्वजनिक तौर पर माफी मांगकर केन्द्र सरकार को ललकारा था कि अगर वह इस आंदोलन को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक चले जाए लेकिन यह आंदोलन जारी रहेगा। इसके बाद पंजाब, हरियाणा और यूपी के किसानों ने टिकैत का समर्थन करने का फैसला किया है। वहीं दूसरी तरफ खाप पंचायतों ने आर-पर की जंग लड़ने का ऐलान भी कर दिया है। इसके साथ दिल्ली में बैठी बहरी व जुमले वाली सरकार को चेता दिया है कि जल्द से जल्द किसानों की बात नहीं मानी गयी तो आंदोलन तेज होगा पीएम को पद छोड़ना होगा।

बुधवार को भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने हरियाणा के जींद में हजारों किसानों के साथ महापंचायत करके सरकार पर और दबाव बनाने की बात कही है। टिकैत ने मोदी सरकार को चेताया कि अगर कानूनों को वापस नहीं लिया गया तो उसके लिए सत्‍ता में बने रहना चुनौती होगी। इसके साथ दिल्ली की सीमाओं पर जो तारबंदी करने के साथ किलेबंदी की है उसको लेकर कहां की जो राजा डरता है वह ऐसा करता है।

किसान आंदोलन पर विदेशी लोगों द्वारा जो टिप्पणियां की है उसके बाद बॉलीवूड व खेल जगत के लोगों ने उनको करारा जवाब दिया है। अजय देवगन, लता मंगेशकर, अक्षय कुमार, सचिन तेंदुलकर व विराट कोहली सहित कई बड़े लोगों ने ट्वीट किया है कि किसी भी भारतीय मुद्दे पर विचान करने के लिए भारत सक्षम है।

दिन-रात कांटों व पत्थरों में खेती करने वाले किसानों को कांटों से डराने चला फेकू मोदी

पिछले 2 महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है और किसान सगंठन 3 नये कृषि बिलों को समाप्त करने की मांग को लेकर दिल्ली की सिमाओं पर आंदोलन कर रहे है। 2 महीने के अन्तराल में किसानों और सरकार के बीच कई दौरे की वार्ता हो चुकी है लेकिन इसके बाद भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया है और इस दौरान किसानों ने सरकार को जगाने के लिए कई प्रकार के प्रयास किये लेकिन मोदी सरकार किसानों की बात को अनसुना कर रही है।

26 जनवरी के दिन ट्रेक्टर परेड़ के दौरान लाल किले पर जो हिंसा हुई उसको लेकर किसानों पर कई तरह के आरोप लगाये जा रहे है और किसान संगठन इस हिंसा पर खेद प्रकट करने के साथ हिंसक प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की मांग की और एक बार फिर दिल्ली कूच करने की तैयारी शुरू कर दी है। कृषि कानून के खिलाफ किसानों ने अपने आंदोलन को तेज करने के साथ 6 फरवरी को चक्का जाम का ऐलान कर दिया है। ऐसे में दिल्ली के बॉर्डरों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है, गाजीपुर बॉर्डर पर तार, नुकीली कील और बैरिकेडिंग तक लगा दी गई है, सुरक्षा के मध्यनजर ट्रेनों को भी डाइवर्ट किया जा रहा है।


किसानों ने पहले ही चेतावनी दी है कि वह तीनों बिलों खत्म करने के बाद ही अपना आंदोलन खत्म करेंगे। दिल्ली की सीमाओं पर जो कंटीले तारों व कीलों आदि वाली जबर्दस्त बैरिकेडिंग की गई है जिसकों लेकर किसानों ने कहा कि वह दिन-रात खेतों में कांटों व पत्थरों के बीच रहकर खेती करता है तो उसे इन तारों के जाल से नहीं डराये तो सरकार के लिए अच्छा होगा।


सरकार के सख्त रूख को देखते हुए राकेश टिकैत ने कहा कि हमने सरकार को अक्टूबर तक का समय दिया है और इसके बाद भी सरकार हमारे मांगें नहीं मानती है तो 40 लाख ट्रैक्टरों के साथ देशव्यापा ट्रैक्टर रैली निकालेंगे। टिकैत ने कहा कि कानून वापसी नहीं तो घर वापसी नहीं की बात भी कही है। सरकार उन किसानों को डरा रही है जो गर्मी,सर्दी और बारिश के मौसम में तपकर बढ़ा हुआ है और उसे कभी पानी की धार से तो कभी पुलिस बल से तो कभी कांटों का डर दिखा रही है जो किसी हास्यपद से कम नहीं है।

जुमले वाली सरकार के बजट से आम व खास हुआ निराश, जानें पूरी खबर

भारत के इतिहास में पहली बार पेपरलेस बजट प्रस्तुत किया गया लेकिन इस बजट को लेकर लोगों ने मोदी सरकार की जमकर आलोचना की है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे मेड इन इंडिया टैबलेट से पढ़ा जो अच्छी बात है लेकिन उनके इस टैबलेट से आम व खास के लिए कुछ नया नहीं निकला।

सामाजिक सुरक्षा के दायरे में ठेका कर्मचारी को पहली बार सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 में गिग और प्लेटफॉर्म कर्मचारियों को शामिल किया गया। डिजिटल जनगणना के लिए सरकार ने बजट में 3ए760 करोड़ रुपये देने का ऐलान किया है। इस बजट के बाद आम जनता की जेब ढीली होने वाली है क्योंकि इस बजट के बाद घरेलू सामानों की किमतों में जबरदस्त इजाफा देखने को मिलेगा। पेट्रोल, डीजल, शराब, लेदर, सोना, चांदी और गाड़ियां जैसी चीजों की कीमत में बदलाव देखने को मिलेगा।

18 प्रोडक्ट्स महंगे
मोबाइल पार्ट्स, बैटरी और चार्जर ,फ्रिज,एसी पर 5 प्रतिशत तक इंपोर्ट ड्यूटी बढाई गयी है। इसके साथ ही आने वाले दिनों में पेट्रोल व डीजल की कीमतों में भारी इजाफा देखने को मिल सकता है। इसके कारण सभी चीजों के दाम बढ़ना तय है।

8 सामान सस्ते हुए
आम आदमी से परे गोल्ड, सिल्वर और प्लेटिनम की ज्वैलरी पर इंपोर्ट ड्यूटी 5 प्रतिशत कम की गई है। इसके कम होने से आमजन को कोई बड़ा फायदा नहीं होता दिख रहा है। इस बजट के बाद लोगों ने कहा कि कोरोना के कारण जब लोगों की नौकरी चली गयी है और लोगों को नौकरी का इंतजार है। लेकिन इस बजट में नौकरियों को लेकर कोई ऐलान नहीं किया है।

इस बजट में किसानों के लिए कोई बड़ा ऐलान नहीं किया गया जबकि पिछले 2 महीने से किसान संगठन कृषि बिलों को खत्म करने व एमएसपी को लेकर आंदोलन कर रहे है। अगर इस बजट में किसानों को राहत के लिए कुछ बड़े फैसले लिये जाते तो किसानों को विश्वास होता की मोदी सरकार उनके हितों के बारे में सोचती है लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिला।

 

जुमले वाली सरकार का फेकू बजट 2021: जानिए पूरा बजट

कोरोना काल में मोदी सरकार का बजट लोगों को कितना पसंद आयेगा इसके बार में तो अभी लोगों की प्रतिक्रिया आना बाकी है लेकिन कोरोना काल के नाम पर जुमले वाली सरकार का यह फेकू बजट किसानों, सेना और आम जनता के लिए क्या लेकर आया है इसके बार में नीचे विस्तार से जान सकते हैं। पिछले साल कोरोना काल की आड में फेकू सरकार ने 3 नये कृषि कानून बिल पास कराके उन्हें लागू कर दिया लेकिन पिछले 2 महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है और फेकू सरकार किसानों की मांग नहीं मान रही है और उनको सड़कों पर रात गुजराने पर मजबूर कर रही है।

75 साल से अधिक उम्र वाले पेंशनधारकों को इनकम टैक्‍स नहीं भरना होगा
ट्राइब्यूनल्स के कामकाज़ को सुधारा जाएगा
जनगणना डिजिटल होगी
लेह में सेंट्रल युनिवर्सिटी बनाई जाएगी
100 नए सैनिक स्कूल खोले जाएंगे
बैंकों में 20,000 करोड़ की पूंजी डाली जाएगी

कश्मीर क्षेत्र में गैस पाइपलाइन का विस्तार किया जाएगा
3 नए रुट्स पर रेलवे नए फ्रंट कॉरोडोर बनेंगे
सरकारी बस सेवा पर 18000 करोड़ का खर्च होगा
मार्च 2022 तक 8500 किमी हाईवे बनाए जाएंगे
3 नए रुट्स पर रेलवे नए फ्रंट कॉरोडोर बनेंगे
अर्बन जल जीवन मिशन लॉन्च किया जाएगा
कोरोना वैक्सीन के लिए 35,000 करोड़ आवंटित

स्वास्थ्य योजना पर 64180 करोड़ रुपये खर्च होंगे
17 नए अस्तपताल शुरु किए जाएंगे
सभी राज्यों का स्वास्थय डाटा बेस बनाया जाएगा
सभी राज्यों का इंटीग्रेटिड डाटा बेस तैयार होगा
किसानों की आय दोगुनी होगी
भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी
आत्मनिर्भर भारत के लिए नई योजना लॉन्च करेंगे

वार्ता से पहले किसानों ने साफ कर दिया अपना रूख! जानें पूरी खबर

किसान आंदोलन को खत्म करने के लिए केन्द्र सरकार ने किसानों से अब तक 6 बार बातचीत करने का प्रयास किया लेकिन इससे कोई नतीजा नहीं निकल पाया है। केन्द्र सरकार द्वारा किसानों से बातचीत करने के लिए 7वें दौर की वार्ता के लिए बुलाया है लेकिन इस वार्ता से पहले किसानों ने अपना रूख साफ कर दिया है िकवह आंदोलन तभी खत्म करेंगे जब तीनों बिलों को खत्म करने के साथ एमसीपी को कानूनी अधिकार बनाया जाएगा। इस वार्ता से पहले ही लगने लगा है कि सरकार किसी भी हद तक अपने रूख में नरमी नहीं बरतेगी वह इस बिल को लेकर साफ कह चुकी है कि यह बिल किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है जो आने वाले भविष्य में उनको कर्ज जैसी परेशानी से छूटकारा दिलाएगा।

7वें दौर की वार्ता के लिए किसान आज 2 बजे विज्ञान भवन दिल्ली जाएंगे और वहां सरकार के मंत्रियों के साथ वार्ता करेंगे। किसानों के इस आंदोलन में कई सामाजीक संगठनों के साथ पूरा विपक्ष उनका समर्थन कर रहा है लेकिन केन्द्र सरकार को यह लगता है कि यह आंदोलन एक राजनीतिक और विदेशी ताकतों के इशारों पर चल रहा है। इस आंदोलन में जियो कंपनी को लेकर कई प्रकार के भ्रामक प्रचार भी किया जा रहा है जिसके चलते जियो कंपनी के टॉवरों पर बिजली की सप्लाई बंद कर दी गयी है।


किसान आंदोलन को लेकर दुनिया भर में चर्चा हो रही है कि भारत किसानों पर निर्भर है और वहां पर किसानों की हालात इतनी खराब है कि किसान को आत्महत्या तक करनी पड़ती है। अब यह देखना होगा कि आज की वार्ता के बाद क्या परिणाम निकलता है अगर इस वार्ता के बाद किसान आंदोलन खत्म नहीं करते हैं तो वे इस आंदोलन को और तेज करने का प्रयास करेंगे जिसके चलते केन्द्र सरका की परेशानी बड़ सकती है।

अन्ना हजारे ने केन्द्र सरकार को दे डाली ये बड़ी धमकी, जानें पूरी खबर

पिछले एक महीने से किसान आंदोलन को कई लोगों का समर्थन मिला है और अब इस आंदोलन को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का समर्थन मिल गया है। हजारे ने साफ शब्दों में कहा दिया है कि आने वाले दिनों में अगर किसानों की मांगे नहीं मानी गयी तो वह भूख हड़ताल करेंगे। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के रालेगण सिद्धि गांव में अन्ना हजारे ने पत्रकारों से कहा कि वह किसानों के साथ 3 साल से प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन सरकार ने इन मुद्दों के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया।


हजारे ने कहा कि सरकार सिर्फ दिखावा करती है इसलिए मुझे उस पर अब कोई विश्वास नहीं है। हजारे ने कहा कि उन्होंने एक महीने का समय मांगा है और मैंने उन्हें जनवरी अंत तक का समय दिया है अगर इस वक्त में उनकी मांगे नहीं मानी गयी तो वह भूख हड़ताल करेंगे। इससे पहले सरकार और किसानों के बीच वार्ता जारी है लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकल पाया है।

 

अन्ना हजारे ने केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर को 14 दिसम्बर को पत्र लिखकर कहा कि एम. एस. स्वामीनाथन समिति की अनुशंसाओं को लागू करने और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) को स्वायत्तता प्रदान करने संबंधी उनकी मांगों को जल्द से जल्द माने नहीं तो वह आंदोलन करेंगे। हजारे ने तीन कृषि कानूनों को खत्म करने की मांग को लेकर 8 दिसम्बर को भारत बंद के समर्थन में उपवास रखा था। अब यह देखना होगा की केन्द्र सरकार किसानों की मांगे कितनी जल्दी मानती है या फिर हजारे को उपवास पर बैठना होगा।

किसान आंदोलन का 19वां दिन: सभी जिला मुख्यालयों पर धरना देंगे किसान

नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के खिलाफ देश भर के किसानों के विरोध प्रदर्शन का आज 19वां दिन है और अब यह आंदोलन धीरे—धीरे देश के सभी हिस्सों में फैल रहा है। खबरों के अनुसार बताया जा रहा है कि दिल्ली की सीमाओं पर किसान 8 बजे से भूख हड़ताल पर बैठने का फैसला करने के साथ आज देश भर में किसान सभी जिला मुख्यालयों पर धरना दिया जाएगा। इस आंदोलन पर जबरदस्त राजनीति भी देखने का मिल रही है जिसके चलते इस आंदोलन को लेकर कई प्रकार के सवाल भी खड़े किये जा रहे हैं।


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी किसानों की भूख हड़ताल का समर्थन करते हुए वह खुद भूख हड़ताल पर बैठेंगे इस फैसलों को पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने केजरीवाल के उपवास को नौटंकी करार दिया है। किसानों के आंदोलन को लेकर मोदी सरकार हर प्रकार से किसानों से वर्ता करने के​ प्रयास कर रही है वहीं अब इस मुद्दे पर खुद अमित शाह लगातार बैठके कर रहे हैं।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को किसानों को मनाने के लिए अलग-अलग राज्यों और यूनियनों की जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन,अमित शाह ने पंजाब के किसान नेताओं से बातचीत करने की जिम्मेदारी अपने पास रखी है। इस आंदोलन से जुड़े कई किसान नेताओं ने इससे दूरी बना ली है।


किसान दिल्ली-जयपुर हाईवे बंद करने के लिए राजस्थान-हरियाणा बॉर्डर पर भारी संख्या में जमा होने लगे हैं। इस आंदोलन को देश के खतरा बताने के साथ इसके तार पाकिस्तान से भी जोड़ने की बाते सामने आ रही है लेकिन किसान नेता पहले ही कह चुके हैं कि हमें किसी भी राजनीतिक पार्टी की जरूरत नहीं है हम अपने अधिकार के लिए खुद लड़ सकते हैं।

भारत बंद में किसानों से ज्यादा विपक्ष उतरा सड़कों पर

मंगलवार को किसानों द्वारा भारत बंद के समर्थन में विपक्षी दलों ने ज्यादा उत्साह नजर आया और लगभग देश के सभी राज्यों में किसानों से ज्यादा विपक्ष सड़कों पर उतरकर भारत बंद को सफल बनाने का काम किया है। अगर बात करें राजस्थान की तो यहां सरकार के कई मंत्री सड़कों पर उतरे और किसानों को हक दिलाने में उनके साथ खड़े रहने का वादा किया। अगर बात करें पूरे देश की तो कई जगह आगजनी और झड़प की खबरे भी देखने ​को मिली।


बंद को समर्थन देने वाले विपक्षी दल
भारत बंद को इन दलों ने समर्थन दिया है – कांग्रेस, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, द्रमुक और इसके घटक, टीआरएस, राजद, आम आदमी पार्टी, सपा, बसपा, वामदल, पीएजीडी।

देशव्यापी भारत बंद के दौरान किसी प्रकार की कोई घटना घटित नहीं हो इसके मध्यनजर केंद्र ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सुरक्षा बढ़ाने और शांति सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किये हैं।भारत बंद के दौरान आम जनता को काफी परेशानियों का भी सामान करना पड़ रहा है और शादियों के सीजन के चलते बहुत ज्यादा परेशानी होती नजर आ रही है। कई किसाने दिल्ली की सीमा पर डटे हुए है और उनको केन्द्र सरकार ने कहा कि प्रदर्शन करने या बंद करने से किसी भी समस्या का समाधान नहीं होगा।

राजस्थान कांग्रेस ने राज्यपाल कलराज मिश्र को दिया ई – ज्ञापन  , 21 सितम्बर, 2020 धरना व् प्रदर्शन 

# कृषि बिलों के विरोध में कांग्रेस 
राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष एवं प्रदेश के शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा द्वारा राज्यपाल  कलराज मिश्र को कोरोना महामारी के चलते ई-मेल के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति महोदय के नाम केन्द्र सरकार द्वारा देश के किसानों और कृषि व्यापार से संबंधित लाये गये तीन विधेयकों के विरोध तथा उन्हें लागू नहीं करने की मांग को लेकर ज्ञापन प्रस्तुत किया गया।
 राज्यपाल महोदय को सौंपे गए ज्ञापन में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तथा विभिन्न किसान संगठनों से जुड़े 20 किसान नेताओं ने अपने हस्ताक्षर कर केन्द्र सरकार द्वारा देश के किसानों और कृषि व्यापार की कमर तोडऩे वाले इन विधेयकों को वापस लेने की पूरजोर माँग की गई है।
राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा ने बताया कि केन्द्र सरकार की किसान 

 

विरोधी नीतियों तथा कृषि उपज, वाणिज्य और व्यापार (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश, मूल आश्वासन एवं कृषि सेवा समझौता अध्यादेश और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश द्वारा देश के लाखों आढ़तियों, मण्डी मजदूरों और खेत मजदूरों को समाप्त करने, कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देकर किसानों की जमीनहड़पने तथा जमाखोरी और कालाबाजारी को बढ़ावा देने वाले उक्त अध्यादेशों के विरोध में सोमवार, 21 सितम्बर, 2020 को प्रात: 11 बजे जयपुर सहित समस्त जिला मुख्यालयों पर जिले में स्थित केन्द्र सरकार के कार्यालय के समक्ष धरना व प्रदर्शन किया जाएगा
उन्होंने बताया कि जयपुर शहर व देहात जिला कांग्रेस द्वारा जयपुर स्थित भारतीय खाद्य निगम के टोंक रोड़ स्थित क्षेत्रीय कार्यालय के समक्ष प्रात: 11 बजे धरना व प्रदर्शन किया जाएगा। उक्त धरना, प्रदर्शनों के दौरान राज्य सरकार द्वारा केन्द्र सरकार द्वारा जारी कोरोना महामारी की गाईडलाईन का पूर्णतया ध्यान रखा जाएगा