कई राज्यों में बरपा बर्ड फ्लू का कहर: जानें राजस्थान का हाल

कोरोना वायरस के टीके की खबर से देश को थोड़ी राहत मिली ही थी कि अब कई राज्यों में बर्ड फ्लू ने चिंता बढ़ा दी है। पिछले एक सप्ताल में कई राज्यों में भारी तादाता में पक्षियों की तेजी से मौत हो रही है। राजस्थान में कई जिलों में कौवों की बड़ी संख्या में मौते होने की खबर से सरकारी और प्रशासन की चिंता बढ़ गयी है। अगर बात करें हरियाणा के पंचकुला की तो यहां 1 लाख से अधिक पोल्ट्री पक्षियों की मौत की खबरें सामने आ रही है। इस खबर के बाद प्रशासन ने व्यापक फोरेंसिक जांच शुरू कर दी है।

राजस्थान में 100 से ज्यादा पक्षियों की मौत
राजस्थान में भी कई जिलों में पक्षियों की मौत की खबरे आना शुरू हो गया है राज्य के विभिन्न जिलों में 150 से ज्यादा पक्षियों की मौत हो चुकी है। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 425 से अधिक कौवों, बगुलों और अन्य पक्षियों की मौत हुई है इसके बाद पक्षियों के नमूनों को जांच के लिये भोपाल के राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान भेजा गया है।

केरल में 40,000 पक्षियों को मारना पड़ा है।
केरल के कुछ जिलों में बर्ड फ्लू फैलने की जानकारी सामने आई है और इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों के एक किलोमीटर के दायरे में बत्तख, मुर्गियों और अन्य घरेलू पक्षियों को मारने का आदेश जारी किया है। अधिकारियों ने कहा कि वायरस को रोकने के लिए करीब 40,000 पक्षियों को मारना पड़ेगा।

हिमाचल में 1500 से ज्यादा प्रवासी पक्षियों की मौत
हिमाचल प्रदेश में पोंग बांध झील अभयारण्य में अब तक 1500 से ज्यादा प्रवासी पक्षी मृत मिले हैं । अभी तक यहां बर्ड फ्लू की पुष्टि की बात नहीं कही जा रही है।


अगर बर्ड फ्लू के कारण इन पक्षियों की मौत हो रही है तो यह बहुत ज्यादा चिंता का विषय है जो कोरोना काल में प्रशासन के लिए नई परेशानी खड़ी कर सकता है। राजस्थान में पहले भी सांभर जिले में प्रवासी पक्षियों की बड़ी तादाद में मौत हुई थी और इसको लेकर काफी राजनीति भी देखने को मिली थी। लोगों को इस समय ज्यादा सावधानी रखने की जरूरत है और अब कोरोना के साथ बर्ड फ्लू से भी अपना बचाव करना होगा।

किसान आंदोलन : ना दबेगा ना झुकेगा अपने हक के लिए जंग भी लड़ेगा –

नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों का आंदोलन आने वाले दिनों व्यापक रूप लेता हुआ नजर आ रहा है। किसानों के आंदोलन का आज 16वां दिन है और अब तक किसानों को मनाने के लिए 6 राउंड बातचीत के बाद सरकार की लिखित कोशिश करने के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकल पाया है। इसके साथ देश के सभी किसान अब आंदोलन तेज करने में जुट गये है।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने साफ शब्दों में कहा है कि सरकार सिर्फ विरोध खत्म करवाने में लगी है। लेकिनआंदोलन जब तक खत्म नहीं होगा तब तकक तीनों कानूनों वापस नहीं ले लिए जाएं और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अलग से बिल लाने की बात भी कही। इसके साथ आने वाले दिनों देशभर में रेल पटरियों को जाम करने की तैयारी चल रही है।

 

 

आने वाले दिनों में किसान देशभर में हाईवे जाम करने की तैयारी करने में जुटे हैं। हालाकि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर लगातार किसानों से आंदोलन खत्म करने और साथ मिलकर हल निकालने की अपील भी कर रहे है। सरकार ने कृषि कानूनों में बदलाव करने समेत 22 पेज का एक प्रारूप बुधवार को किसानों को भेजा था, लेकिन इससे भी कोई हल नहीं निकल पाया।

कोरोना काल में यह आंदोलन सरकार और किसानों के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकता है क्योंकि लोगों की भीड़ होने के कारण कोरोना का प्रसार आसानी से और तेजी से बढ़ सकता है। लेकिन आजादी के बाद से किसानों का हाल सुधरने की जगह बिगड़ता ही जा रहा है और इस बार किसानों ने फैसला किया है कि वे इस बार अपने हक के लिए आर—पर की लड़ाई लड़ने के लिए भी तैयार है।

 

किसानों को हर बार केन्द्र और राज्य सरकारे उनके हितों की बात करती है लेकिन जब भी उनके हक की बात आती है तो इस पर राजनीति होनी शुरू हो जाती है। भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे मजबूत कड़ी कृषि को माना जाता है लेकिन इससे जुड़े किसानों की भलाई की बात आती है तो सभी पार्टियां उनको नजरअंदाज करती हुई नजर आती है। कृषि सुधारों के लिए कई कमेटिया बनाई गयी लेकिन वह सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गयी।

 

उत्तर भारत शीतलहर की चपेट में, 48 घंटों में 38 की मौत

नई दिल्ली। तीव्र शीतलहर से सम्पूर्ण उत्तर भारत प्रभावित है। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में सामान्य जीवन प्रभावित हुआ है। उत्तर प्रदेश में बीते 48 घंटों में 38 लोगों के मौत की सूचना है। शीर्ष मौसम वैज्ञानिकों को आशंका है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की बेरुखी सामने आई है।

भूमध्य सागर में उत्पन्न होने वाले असमान्य और शक्तिशाली ‘पश्चिमी विक्षोभ’ ने हिंदी पट्टी सहित समूचे उत्तर भारत को बीते पखवाड़े से ठिठुरने को मजबूर किया है। यह स्थिति चार से पांच दशकों में एक बार पैदा होती है, जो लोगों को नए साल की पूर्व संध्या पर भी कंपकंपाएगी।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र जेनामणि ने कहा, ‘यह लंबी अवधि है, जिसकी प्रकृति अनोखी है और यह पूरे उत्तरपश्चिम भारत पर असर डालेगी।’ शीर्ष वैज्ञानिकों को आशंका है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की बेरुखी सामने आई है और अप्रत्याशित मौसम की यह स्थिति लोगों को परेशान करती रहेगी।

गंगा के मैदानी क्षेत्रों में घना कोहरा और हिंद महासागर की असामान्य वार्मिंग पश्चिमी विक्षोभ के लिए जिम्मेदार हैआने वाले सालों में उत्तर भारत मौसम के लोगों को मौसम की बेरुखी झेलनी पड़ सकती है। मौसम वैज्ञानिक आम तौर पर ज्यादा ठंड की अवधि 5 या 6 दिनों होती है। लेकिन इस साल 13 दिसंबर से तापमान में गिरावट जारी है

उष्णकटिबंधीय तूफान से भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरपश्चिम भाग में अचानक से ठंड के मौसम में बरसात हुई, जिससे देश के कुछ शहरों में दिन का तापमान 12 डिग्री से नीचे हो गया। हिमालयी क्षेत्र व गंगा के मैदानी क्षेत्र जिसमें पूरा उत्तर भारत शामिल है, मौसम को लेकर ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं और यहां के लोगों को मौसम की बेरुखी झेलनी पड़ सकती है।

गंगा के मैदानी इलाकों में स्मॉग (धुंध) का असर मौसम पर पड़ रहा है। उनके शोध से संकेत मिलता है कि पिछले कुछ वर्षों में तापमान में बदलाव का एक अप्रत्याशित पैटर्न चल रहा है। यह पैटर्न जारी रहेगा और निकट भविष्य में इसका मौसम पर ज्यादा गंभीर असर पड़ेगा। डॉ. सिंह ने कहा, ‘ध्यान देने की बात है कि अगर ज्यादा प्रदूषण होगा तो ज्यादा धुंध होगा।

दिल्ली में दिसंबर की सर्दी 1901 के बाद दूसरी बार सबसे सर्द
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में दिसंबर की सर्दी का यह आलम है कि यह 1901 के बाद दूसरी बार ऐसा हो सकता है जब साल का आखिरी महीना इतना सर्द रहा हो।

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