महात्मा ज्योतिराव फुले – सामाजिक क्रांति के अग्रदूत रहें हैं युवा शक्ति को उनका अनुसरण करना चाहियें – शुश्री शाहिस्ता  

संवैधानिक अधिकार संगठन का विशेष सत्र – आओं महामानवों को जानें 
#महात्मा ज्योतिराव फुले 
14  अप्रैल 2021 से  “ डॉ बाबा साहब की जयंती “  से 100 महामानवों के जीवन पर होगी चर्चा
जयपुर | डॉ बाबा साहब आंबेडकर जी के 130वीं जयंती के अवसर पर संवैधानिक अधिकार संगठन ने एक नई मुहीम शुरू की हैं जिसमें सामाजिक क्षेत्र में सुधार करने वालें महामानवों के बारें में विस्तृत से हम जानें क्योकिं आज की युवा शक्ति अपने महामानवों को सिर्फ जयंतीयों तक ही सीमित कर दिया हैं जबकि हमें उनके संघर्ष को जानना चाहियें और आत्मसात करना चाहियें और अपने जीवन में उनके संघर्ष से प्रेरणा लेकर सामाजिक क्षेत्र में समानता , बंधुता , स्वतंत्रता न्याय मुल्लों को व्यवहार में अमल लाना चाहियें जिससे समता मूलक समाज का निर्माण हो सके |
कार्यक्रम में मुख्यवक्ता सामाजिक कार्यकर्ता शाहिस्ता खान ने ज्योतिराव फुले के जीवन के विभिन्न घटनाओं पहलों पर  विस्तृत जानकारी अन्य साथियों से साझा की उन्होंने कहा की ज्योति राव फूले ने अपने जीवन में जातीय आधारित गैर बराबरी व्यवस्था के शिकार रहें और इस व्यवस्था को बदलने के लिये ताम्र संघर्ष करते रहें उनके संघर्ष में उनकी जीवनसाथी माता सावित्रीबाई फुले ने उनका साथ दिया और  सावत्री बाई फुले पहले खुद शिक्षित बने और – बालिकाओं महिला शिक्षा को प्राथमिकता देते हुयें 1 जनवरी 1848 को लड़कियों का पहला स्कूल शुरू किया था जब ज्योतिराव फुले को उनके जीवनसाथी सावित्रीबाई फुले के साथ पिता ने घर से बाहर निकाल दिया था  तब उनके मित्र उस्मान भाई और उनकी छोटी बहन फ़ातिमा शेख ने उनका साथ दिया तथा  माँ सावत्री बाई के साथ मिलकर उस्मान भाई के घर पर ही पहला बालिका स्कूल खोला यह विकसित समाज की सोच रही थी एक उनका संघर्ष था और आज भी हम 2021 में भी महिला सशक्तिकरण , सुरक्षा और बराबरी की बात कर रहें हैं |
प्रदेशाध्यक्ष धर्मेन्द्र तामडिया ने कहा कि सामाजिक क्रांति के अग्रदूत  संवैधानिक भारत के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले जब अपने सामान्य जाति के मित्र के विवाह समारोह में बरात में गए हुए थे तो वहां से सामान्य जाति के लोगों ने शूद्र कहकर अपमानित  किया और तुम चले जाओ यहां से तुम शूद्र हो हमारे सामान्य जाति के लोगों के साथ साथ में शामिल नहीं हो सकते और विवाह समारोह से बेदखल कर दिया था तब फुले जी को बहुत अपमानित होना पड़ा था और तभी से फुले जी ने क्रांति की शुरुआत कर दी थी उन्होंने ठान ली थी कि जब मेरे ओबीसी समुदाय के साथ इतना जातिवाद छुआछूत किया जा रहा है तो मेरे दलित अछूत भाइयों के साथ कितना अपमानजनक व्यवहार किया जाता होगा यह मैं सोच भी नहीं सकता तभी फुले जी ने वंचित और दलितों, शूद्रों के लिए पहला स्कूल 1948 में खोला था महात्मा फुले ने माता सावित्रीबाई फुले को पढ़ा लिखा कर महिला सशक्तिकरण की सोच के साथ आगे बढ़ाने के लिए महिला स्कूल खोलने के लिए प्रेरित कर 1857 में महिला स्कूल की स्थापना कर माता सावित्रीबाई फुले को स्कूल में पढ़ाने के लिए प्रेरित किया फुले दंपति ने अपने जीवन काल में अनाथ आश्रम, विधवा महिलाओं के लिए आश्रम और सभी को शिक्षा देने का काम किया और हमेशा समता की पक्षधर फुले जी ने जाति धर्म छुआछूत का विरोध अंतिम समय तक किया |
सीमा कुमारी – मुख्य सलाकार ने आपकी महात्मा फुले जी ने महिला सशक्तिकरण के लिए माता सावित्रीबाई फुले को पढ़ा लिखा कर देश की प्रथम महिला शिक्षिका बनाने का काम किया और जब माता सावित्रीबाई फुले महिलाओं को शिक्षा देने के लिए जाती तो उन पर सामान्य जाति की महिलाएं गोबर फेंक दी थी जिसके कारण उनको 2 साड़ियां बैग में साथ में लेकर चलती थी लेकिन इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने महिलाओं को शिक्षा देने का काम बंद नहीं किया अगर सावित्रीबाई फुले ने संघर्ष घर की महिलाओं को शिक्षा नहीं दी होती तो शायद आज आम महिलाओं को शिक्षा अधिकार मिल पाना मुश्किल होता सभी को धन्यवाद प्रस्तुत कर कार्यक्रम समापन किया गया |
इस अवसर पर विभिन्न राज्यों से सामाजिक कार्यकर्ता जुड़े गुजरात से जिग्नेश सोलंकी, विजय मकवाना, छत्तीसगढ़ से कृष्णा पाठक,  चंद्रमोहन मौर्य, राम तरुण जी , पवन देव , साबिर कुरैशी , रतन लाल बेरवा  ,  राज बाला जी , मीरा जी ,   उग्नता जी , आदि कार्यकर्ता उपस्थित रहे |