भारत बंद: जयपुर में भाजपा और कांग्रेसी कार्यकर्ता भीड़े, दिल्ली के सीएम नजरबंद!

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के साथ देश की कई विपक्षी पार्टियों ने किसान के भारत बंद का समर्थन किया है। लेकिन खबरों के अनुसार बताया जा रहा है कि दिल्ली पुलिस ने नजरबंद कर दिया है और इस बात की जानकारी आम आदमी पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इसे जारी किया गया है। हालाकि दिल्ली पुलिस ने AAP के दावे को गलत करार दिया है।

वहीं बात करें राजस्थान की राजधानी जयपुर की तो यहां पर भारत बंद के दौरान बीजेपी और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में हाथपाई की नौबत आ गयी। इसके बाद पुलिस ने बीचबचाव करते हुए दोनों दलों के कार्यकर्ताओं को दूर किया।

यूपी में भी सपा के कार्यकर्ताओं ने किसानों से ज्यादा योगी सरकार के खिलाफ अपना आक्रोश प्रकट किया और कई जगह सड़के बंद करने के साथ ट्रेने रोक दी। इसके साथ योग सरकार ने पहले ही चेतावनी जारी कर दी थी कि अगर कोई जोर—जबरदस्ती से बंद करने का काम करता है तो उस पर सख्त कार्यवाही की जाएगी।

किसान संगठनों ने पहले ही कह दिया था कि हमारे मंच ​से किसी भी राजनीतिक पार्टी को राजनीति नहीं करने दिया जाएगा। लेकिन इसके बाद भी इस आंदोलन में किसानों की हितों की कम और अपनी राजनीति करने का ज्यादा दिखावा हो रहा है।

 

 

हुकूम” आपको नाम बदलने के लिए नहीं सबका साथ सबका विकास करने के लिए सत्ता सौंपी थी – आम मतदाता का दर्द

“हुकूम” आपको नाम बदलने के लिए नहीं सबका साथ सबका विकास करने के लिए सत्ता सौंपी थी !
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लेकिन जिन्होंने 60 साल पहले के नेहरू को ईमानदारी से नहीं पढा, वो सवा चार सौ साल पहले के अकबर ए आज़म को क्या पढेंगे “
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इलाहाबाद और मुग़ल सराय का नाम ही क्यों पूरी डिक्शनरी ही बदल दीजिए –
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2014 में सबका साथ सबका विकास और अच्छे दिनों के आने का वादा कर केन्द्र की सत्ता में आई भाजपा ने एक के बाद करीब डेढ़ दर्जन राज्यों में भी फ़तह का परचम फहराया। कुछ राज्यों में पहले से भाजपा की सरकारें थीं। केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। लोगों को अच्छे दिन आने की उम्मीद थी ! सबके विकास की उम्मीद थी ! सबके साथ की उम्मीद थी ! रोटी और रोजगार की उम्मीद थी ! भ्रष्टाचार खत्म होने की उम्मीद थी ! कालाधन वापस आने की उम्मीद थी ! लेकिन यह सब उम्मीद ही रही और अब तो जनता इन उम्मीदों का इन्तजार भी नहीं कर रही है, क्योंकि उसका हाकिमों के वादों से भरोसा उठ गया है। वो अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रही है। उसके साथ झूठे वादों के जरिये सियासी ठगी हो गई ! आदरणीय सरकार ने पहले नोटबन्दी के तुगलकी फरमान के जरिये अर्थ व्यवस्था की कमर तोङ दी। फिर जीएसटी के जरिये उसे वेंटिलेटर पर पहुंचा दिया। इससे करोङों देशवासियों का रोटी रोजगार छीन गया। इस दौरान जमकर नफरत परोसी गई। अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों को खूनी भीङ ने निशाना बनाना शुरू कर दिया। साथ में शुरू हुआ नाम बदलने का दौर। दिल्ली की औरंगजेब रोड, गुड़गांव, मुग़ल सराय जंक्शन और इलाहाबाद के नाम बदल दिए गए।

जनता ने कांग्रेस के गैर जिम्मेदार शासन और लूटतंत्र को खत्म करने के लिए एक मजबूत विकल्प के तौर पर भाजपा को चुना था। लेकिन वो पूरी तरह से सबका साथ और सबका विकास करने में विफल हो गई। इसे विफलता नहीं कह सकते, बल्कि नीयत में खोट कह सकते हैं। क्योंकि आदरणीय सरकार ने कभी भी जन समस्याओं को गम्भीरता से नहीं लिया। सिर्फ झूठी वाहवाही लूटी और विभिन्न मंचों से सियासी जुमलेबाजी की। अगर नीयत सबका साथ सबका विकास की होती, तो आज देश की यह स्थिति नहीं होती ! नफरत के माहौल, बेरोजगारी के कारण युवाओं में हताशा और बढती महंगाई से देश एक खतरनाक मोङ की तरफ धकेल जा रहा है। लेकिन हाकिमों के पास इस खतरे से निपटने का कोई कारगर उपाय नहीं है। क्योंकि उनकी सत्ता की नींव ही नफरत की सियासत पर टिकी हुई है। नफरत इसलिए परोसी गई या परोसी जा रही है, क्योंकि यह एक पुराना हथियार है। जिससे वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके और सत्ता पर अपना कब्जा बरकरार रखा जा सके। आदरणीय सरकार को जनता ने ऐतिहासिक नाम बदलने के लिए वोट नहीं दिया था, बल्कि कांग्रेस के कुशासन और लूटतंत्र को खत्म करने व बिना किसी भेदभाव के सबका विकास करने के लिए वोट दिया था। लेकिन नाम इसलिए बदले गए ताकि जनता अपने जख्म भूल कर खेमों में बंट जाए और ध्रुवीकरण के जरिये आदरणीय सरकार की वापसी हो जाए।

अब बात करते हैं नाम बदलने के इतिहास की। तो इसमें कोई शक नहीं है कि अधिकतर हाकिमों ने अपने दौर में नाम बदले हैं। चाहे हाकिम राजतंत्र के रहे हों या लोकतंत्र के। राजतंत्र के हाकिमों ने सत्ता हासिल करने या उसे बचाने के लिए जंगें भी लङी हैं। बेगुनाहों का खून भी बहाया है। विरोधियों को कत्ल भी किया है। अपनी मनमर्जी की हुकूमत जनता पर थौपी भी है। एक ही जाति और धर्म के मानने वाले हाकिमों ने एक दूसरे के खातमे के लिए वो सब कुछ किया, जिससे नैतिकता और मानवता इजाजत नहीं देती। ऐसा राजतंत्र वाले अधिकतर हाकिमों ने किया है, चाहे वो किसी भी जाति, धर्म और क्षेत्र से सम्बंधित हों। लेकिन इतिहास की सच्चाई यह भी है कि इन हाकिमों ने बहुत से अच्छे काम भी किए हैं और इनके अच्छे कामों को भुलाना न सिर्फ इतिहास के साथ खिलवाड़ है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को दिशा भ्रमित करने वाला कार्य भी है। जरा गौर कीजिए, अपनी अक्ल से पूछिए, अपनी अन्तरआत्मा से पूछिए कि क्या मुस्लिम बादशाहों ने सब कुछ गलत काम किया था ? नहीं, उन्होंने बहुत से अच्छे काम भी किए थे। हाँ, यह भी सच है कि उन्होंने अपनी सत्ता बचाने या हासिल करने के लिए कई गलत काम भी किए थे।

जहाँ तक नाम बदलने की बात है, तो यह सच है कि मुस्लिम बादशाहों ने भी नाम बदले हैं। अब यह क्यों बदले हैं, कब बदले हैं और इनके पीछे मक़सद क्या था ? इन सवालों का जवाब देने की एक लेख में यहाँ गुंजाइश नहीं है। लेकिन यह सच है कि हमारे देश को हिन्दुस्तान नाम मुसलमानों ने दिया। अगर कोई मुस्लिम बादशाह चाहता तो इस नाम को बदल सकता था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। हिमालय, विंध्याचल, सतपुड़ा, झेलम, सिन्ध, रावी, गंगा, यमुना, कावेरी, घाघरा, हरिद्वार, काशी, मथुरा, वृंदावन, दिल्ली आदि असंख्य नाम ऐसे हैं, जिन्हें किसी भी मुस्लिम बादशाह ने नहीं बदला ! क्यों ? क्या उन्हें नाम बदलने की फुरसत नहीं थी या उनको इनके नए नाम मिले नहीं थे ? अकेले मुग़ल बादशाह अकबर की बात करें, जिसे इतिहास अकबर ए आज़म (अकबर महान) कहता है, ने 49 साल लगातार हमारे देश पर राज किया था। उनके मुंह से निकला हर शब्द राजाज्ञा था, वो 49 में चाहे जो कर सकता था। लेकिन उन्होंने नाम न बदलने की बजाय गंगा जमुनी तहजीब को मजबूत किया। देश की शीर्ष सत्ता में जातीय व धार्मिक सन्तुलन पैदा करने के लिए सभी को समान अवसर दिया। सेनापति मान सिंह, मन्त्री बिरबल, तानसेन आदि इसके उदाहरण हैं।

विश्व में अकबर ही वो पहला शासक था, जिसने शासन व्यवस्था में सेक्यूलरिज्म की बुनियाद रखी थी। अगर बात मुग़ल बादशाह औरंगजेब की करें, जिसकी भी बहुत से इतिहासकार आलोचना करते हैं। उन्होंने भी देश पर अकबर की तरह 49 साल तक एकछत्र राज किया था। उन्होंने भी यह सभी नाम नहीं बदले, जो ऊपर लिखे गए हैं। नई पीढ़ी को मालूम होना चाहिए कि मुस्लिम बादशाहों के शासन में सबसे ज्यादा हिन्दू पदाधिकारी औरंगजेब के शासनकाल में उच्च पदों पर कार्यरत थे। वो औरंगजेब ही था जिसने हिन्दुस्तान को सबसे बङा नक़्शा दिया। यानी क्षेत्रफल की दृष्टि से जितना विशाल भारत औरंगजेब के शासनकाल में था, उतना कभी नहीं रहा। यह इतिहास की सच्चाई है।

अब अगर नाम बदले ही जा रहे हैं। तो कोई बात नहीं बदल दीजिए। लेकिन दो चार नाम ही क्यों ? पूरी डिक्शनरी ही बदल दीजिए ! लेकिन जिन लोगों ने 60 साल पहले के नेहरू को ईमानदारी नहीं पढा, वो सवा चार सौ साल पहले के अकबर ए आज़म को क्या पढेंगे ? वो नेहरू जो हमारे प्रथम प्रधानमंत्री थे। जिन्होंने पूरे विश्व में भारत की शान बढाई। जिन्होंने देश में लोकतांत्रिक और धर्म निरपेक्ष शासन व्यवस्था की बुनियाद रखी। जिन्होंने उस दौर में विश्व के करीब 130 देशों को निर्गुट आन्दोलन के नाम पर विश्व महाशक्तियों अमरीका और सोवियत रूस के खिलाफ लामबन्द कर दिया, जब भारत की अधिकतर जनता अनपढ़ थी और बेहद गरीब भी थी ! वो नेहरू ही थे, जिन्होंने 26 जनवरी 1950 को सभी वयस्क महिलाओं व पुरूषों को मताधिकार दिया, तब, जब अधिकतर महिलाएं व पुरूष अनपढ़ थे ! वो पण्डित जवाहरलाल नेहरू ही थे, जिनका विश्व मंच पर भाषण सुनने के लिए बङे बङे राष्ट्र प्रमुख इन्तजार करते थे ! लेकिन उस नेहरू को आज न सिर्फ़ भुलाया जा रहा है, बल्कि देश का दुश्मन और गद्दार साबित करने की घिनौनी साजिश हो रही है। इसलिए पुनः इस जुमले के साथ यह लेख पूरा कर रहा हूँ कि जिन्होंने 60 साल पहले के नेहरू को ईमानदारी नहीं पढा, वे सवा चार सौ साल पहले के अकबर ए आज़म को क्या पढेंगे ?
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-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।

भाजपा सरकार में ” गोरखनाथ मन्दिर के दलित महंत की असहनीय पीड़ा ” –

गोरखनाथ मंदिर विवाद

जयपुर | सांगानेर इंडिया गेट स्थित महायोगी गुरु गोरखनाथ मन्दिर में जे दी ए द्वारा तोड़फोड़ 27 फ़रवरी को की करवाई की गई थी , जिससे हिन्दू समाज के लोगो ने विरोध किया था , जिसके बाद प्रशासन ने मंदिर की तोड़ी गई दीवार को पुन: बनाने की बात कही थी , किन्तु आज दिनांक तक jda प्रशासन ने मंदिर की कोई सुध नहीं ली है जिसके कारन मंदिर के दलित पुजारी टूटे मंदिर में ही नवरात्रे कर रहे है |

मंदिर पुजारी का कहना है की वह  मंदिर पिछले  50 वर्षो से पूजा -पाठ करते आ रहे है , लेकिन मंदिर के पीछे जब से कॉमर्शियल काम्प्लेक्स बना है उसके उच्च जाती के मालिक को यह चाहते है की वह मंदिर को अन्यत्र ले जाए ताकि उनका कॉम्प्लेक्स का गेट मेन टोंक रोड आ जाये जिसके लिए वह मुझे लम्बे समय से मानसिक प्रताड़ित कर रहे है ,अभी कुछ दिन पहले भी मुझे पर अज्ञात लोगो ने मुझ पर हमला भी किया था जिसकी जानकारी में  यहाँ के पुलिस प्रशासन को की थी लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं नहीं हुई है |

क्या है पूरा मामला – एक नजर –

भाजपा राज में तोड़े जा रहे है मंदिर – हिन्दू संगठनो ने किया विरोध 

सीतापुरा इंडिया गेट सांगानेर स्थित महायोगी गुरु गोरखनाथ जी के मन्दिर में जे डी ए { JDA } ने तोड़फोड़ कर हिंदुत्व के सीने पर आघात पहुंचाया है
आज जो सरकार मंदिर और गाय के नाम पर राजनेतिक रोटियां सेक रही

है क्या उस सरकार को ये सब नहीं दिखता है
या ये सब जातिवाद का ही एक चेहरा है क्योंकि इस मंदिर में बरसों से एक नीची जाती के रामसिंह बैरवा जो कि अनुसूचित जाति { sc }  में आते है पूजा पाठ करते है जब उन्हें मन्दिर के पीछे बनी दुकानों के मालिक जो कि जाति से ब्राह्मण है ने इन्हें हटाकर अपना पण्डित पुजारी रखने को कहा जब नहीं माने तो डराया धमकाया पुजारी रामसिंह बैरवा की गाड़ी में तोड़फोड़ करवाई, पैसे लेकर मन्दिर छोड़ने का प्रलोभन दिया ओर जब भी नहीं मानने पर करीब 30 असामाजिक तत्वों को बुलाकर जे डी ए { JDA }  की कार्यवाही में शामिल करवाकर मन्दिर को साजिश के तहत तुड़वा दिया |

जब कि इस मन्दिर का मामला कोर्ट में लंबित है

दलित पुजारी –  गोरतलब है उपरोक्त मंदिर बाबा गोरखनाथ का है जिसे में लम्बे अर्स से दलित समाज के रामसिंह बैरवा पूजा पाठ करते है जिस को लेकर पड़ोस में रहने वाले ऊँची जाती के लोग विरोध करते है और कई बार मंदिर पुजारी  रामसिंह बैरवा  पर जान लेवा हमला भी हो चुका है अभी कुछ समय पहले पुजारी के वाहन में अज्ञात लोगो ने थोड -फोड़ कर दी थी जिसकी शिकायत पुजारी ने स्थानीय पुलिस में भी की थी |

ख़ास नजर – जिस तरह से भाजपा सरकार में मंदिरों में तोड़ फोड़ की जा रही है उससे जनता में भारी नाराजगी है जिसका खामियाज़ा आगामी विधानसभा चुनावो में भाजपा को मिल सकता है , गोरतलब है उपरोक्त मंदिर बाबा गोरखनाथ का है जिसे में लम्बे अर्स से दलित समाज के रामसिंह बैरवा पूजा पाठ करते है जिसको लेकर भी ख़ास समाज के लोगो द्वारा कई बार भारी विरोध किया गया

 

 

{  जैसा  गोरखनाथ मंदिर के पुजारी ने बताय उसी जुबां तथ्यों पर आधारित }

अभिशाप को दरकिनार करते हुए CM योगी 25 दिसंबर को जाएंगे नोएडा

नई दिल्ली। नोएडा जाने के अभिशाप को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 25 दिसंबर को नोएडा जाएंगे और पीएम नरेंद्र मोदी के साथ मजेंटा लाइन मेट्रो को हरी झंडी दिखाएंगे।सीएम ऑफिस ने योगी के संभावित नोएडा दौरे की पुष्टि की है. दरअसल 25 दिसंबर को नोएडा में मेट्रो की मैजेंटा लाइन का पीएम मोदी उद्घाटन करेंगे। ज़ाहिर तौर पर सूबे में पीएम की मौजूदगी के मौके पर योगी आदित्यनाथ का रहना ज़रूरी है।

 

दरअसल ये अन्धविश्वास है कि जो भी मुख्यमंत्री रहते नोएडा गया वो उस कुर्सी पर दोबारा नहीं बैठा। आखिरी बार मायावती नोएडा गईं थीं और 2012 में उन्हें सत्ता से बेदखल होना पड़ा था। योगी से पहले अखिलेश यादव लगातार पांच साल यूपी के मुख्यमंत्री रहे लेकिन एक बार भी वो नोएडा नहीं गए।इससे पहले मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह भी उत्तर प्रदेश के सीएम रहे लेकिन कभी नोएडा जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।amzn_assoc_ad_type =”responsive_search_widget”; amzn_assoc_tracking_id =”politico24x7-21″; amzn_assoc_marketplace =”amazon”; amzn_assoc_region =”IN”; amzn_assoc_placement =””; amzn_assoc_search_type = “search_widget”;amzn_assoc_width =”auto”; amzn_assoc_height =”auto”; amzn_assoc_default_search_category =”Shoes”; amzn_assoc_default_search_key =””;amzn_assoc_theme =”light”; amzn_assoc_bg_color =”FFFFFF”; //z-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&Operation=GetScript&ID=OneJS&WS=1&Marketplace=IN

इस अपशगुन के इतिहास को देखें तो इसकी शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के साथ हुई घटना से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि साल 1988 में नोएडा से लौटने के तुरंत बाद ही वीर बहादुर सिंह को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ गई थी। इसके बाद 1989 में नारायण दत्त तिवारी और 1999 में कल्याण सिंह की भी नोएडा आने के बाद कुर्सी चली गयी। साल 1995 में मुलायम सिंह को भी नोएडा आने के कुछ दिन बाद ही अपनी सरकार गंवानी पड़ गई थी। नोएडा यात्रा से नेताओं की मुख्यमंत्री यात्रा पर विराम लगने से नोएडा पर अपशकुनी होने का कलंक लगता चला गया। हालांकि बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए नोएडा के अंधविश्वास पर भरोसा नहीं किया।

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