मा .कांशीराम ने जातियों और समुदायों के चमचे किसे और क्यों कहा  – जानें आज की सच्चाई दलितो की 

To whom and why did Mr. Kanshiram say that the spices of castes and communities –

know today’s truth of Dalits

 

“इस लंबी और दुखद कहानी का अंत करने के लिए कांग्रेस ने पूना समझौते का रस चूस लिया और छिलका अछूतों के मुंह पर फेंक  दिया।” -डॉ. बी.आर. आंबेडकर
मा .कांशीराम जी के महा परिनिर्वाण दिवस पर उनकी प्रसिद्ध किताब – चमचा युग से आलेख  – वर्तमान राजनीति में सटीक बैठता हैं 
विभिन्न जातियों और समुदायों के चमचे
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भारत की कुल जनसंख्या में लगभग 85% उत्पीड़ित और शोषित लोग हैं, और कोई नेता नहीं है। वास्तव में ऊंची जातियों के हिंदू उनमें नेतृत्व विहीनता की स्थिति पैदा करने में सफल हुए हैं। यह स्थिति इन जातियों और समुदायों में चमचे बनाने की दृष्टि से सहायक है। विभिन्न जातियों और समुदायों के अनुसार चमचो की  यह श्रेणीया बताई गई हैं
(1) अनुसूचित जातियां-अनिच्छुक चमचे
बीसवीं शताब्दी के दौरान अनुसूचित जातियों का समूचा संघर्ष यह इंगित करता है कि वे उज्ज्वल युग में प्रवेश का प्रयास कर रहे थे किंतु गांधीजी और कांग्रेस ने उन्हें चमचा युग में धकेल दिया। वे उस दबाव में अभी भी कराह रहे हैं। वे वर्तमान स्थिति को स्वीकार नही। कर पाए हैं और उससे निकल भी नहीं पा रहे हैं। इसलिए उन्हें अनिच्छुक चमचे कहा जा सकता हैं
(2) अनुसूचित जनजातियां-नवदीक्षित चमचे
अनुसूचित जनजातियां भारत के संवैधानिक और आधुनिक विकास के दौरान संघर्ष के लिए नहीं जानी जातीं। 1940 के दशक में उन्हें भी अनुसूचित जातियों के साथ मान्यता और अधिकार मिलने लगे भारत के संविधान के अनुसार. 26 जनवरी 1950 के बाद उन्हें अनुसूचित जातियों के समान ही मान्यता और अधिकार मिले। यह सब उन्हें अनुसूचित जातियों के उस संघर्ष के परिणामस्वरूप मिला जिसके चलते राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मत उत्पीड़ित और शोषित भारतीयों के पक्ष में हो गया था आज तक उन्हें भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल में कभी प्रतिनिधित्व नहीं मिलता । फिर भी उन्हें जो कुछ मिल पाता है, वे उसी से संतुष्ट दिखाई देते हैं इससे भी खराब बात यह है कि वे अभी भी इसी मुगालते मे हैं कि उनका उत्पीडक और शोषक ही उनका हितैषी है। इस तरह उन्हें नवदीक्षित चमचे कहा जा सकता हैं क्योंकि उन्हें सीधे-सीधे चमचा युग में दीक्षित किया गया है।
(3) अन्य पिछड़ी जातियां-महत्वाकांक्षी चमचे लंबे समय तक चले संघर्ष के बाद अनुसूचित जातियों के साथ अनुसूचित जनजातियों को मान्यता और अधिकार मिले। इसके परिणामस्वरूप, उन लोगों ने अपनी सामर्थ्य और क्षमताओं से भी बहुत आगे निकलकर अपनी संभावनाओं को बेहतर कर लिया है। यह बेहतरी शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीति के क्षेत्रों में सबसे अधिक दिखाई देती है। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में इस तरह की बेहतरी ने अन्य पिछडी जातियों की महत्वाकांक्षाओं को जगा दिया है। अभी तक तो वे इस महत्वकांक्षा को पूरा करने में सफल नहीं हुए हैं।
पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने हर दरवाजे पर दस्तक दी, किंतु उनके लिए कोई दरवाजा नहीं खुला। अभी जून 1982 में हरियाणा में हुए चुनावों में हमें उन्हें निकट से देखने मौका मिला। अन्य पिछड़ी जातियों के तथाकथित  छोटे नेता टिकट के लिए हरेक दरवाजा खटखटा थे अत: में हमने देखा कि वे हरियाणा की 90 सीटों में से एक टिकट कांग्रेस (आई) से और एक टिकट लोक दल से ले पाए। आज हरियाणा विधान सभा में अन्य पिछडी जाति का और एक टिकट लोक दल से ले पाए। आज हरियाणा विधान सभा में अन्य पिछडी जाति का न एक विधायक है। कुछ स्थानों विशेषकर दक्षिण के कुछ स्थानों को छोड़ हम उन्हें अनेक नों और अनेक स्तरों पर संघर्ष करने के बावजूद अपने अधिकार पाने से यंचित देखते हैं, जैसा कि हरियाणा में है। वास्तव में, उनकी एक बड़ी संख्या वह सब पाना चाहती है जो सूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को पहले ही मिला हुआ है 3700 से भी अधिक अन्य पिछड़ी जातियों में से लगभग 1000 जातियां न केवल अजा/ अजजा की सूची । में सम्मिलित किए जाने की महत्वाकांक्षा कर रही हैं बल्कि उसके लिए संघर्ष भी कर रही हैं। इस प्रकार अन्य पिछड़ी जातियों का कुल व्यवहार हमें इस यकीन की ओर ले जाता है कि ये महत्वाकांक्षी चमचे हैं।
(4)अल्पसंख्यक-असहाय चमचे
सन 1971 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या में धार्मिक अल्पसंख्यकों का प्रतिशत 17.28 है। 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों के भारत छोड़ने से पहले उन्हें उनकी आबादी के अनुसार उनका अधिकार मिल रहा था। उसके बाद तो वे पूरे तौर पर भारत की शासक जातियों की दया पर निर्भर हो गए। सांप्रदायिक दंगों की बहुतायत होने के कारण मुसलमान चौकन्ने रहते हैं। ईसाई बेबस घिसट रहे हैं सिख सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बौद्ध तो संभल भी नहीं पाए हैं। इस सबसे यही प्रमाणित होता है कि भारत के अल्पसंख्यक असहाय चमचे हैं।
(ख) विभिन्न दलों के चमचे
“कांग्रेस का दूसरा दुष्कृत्य था अछूत कांग्रेसियों से कठोर पार्टी अनुशासन का पालन करवाना । वे पूरे तौर पर कांग्रेस कार्यकारिणी के नियंत्रण में थे वे ऐसा कोई सवाल नहीं पूछ सकते थे जो कार्यकारिणी को पसंद न हो। वे ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं रख सकते थे जिसमें उसकी अनुमति न हो। वे ऐसा विधान नहीं ला सकते थे जिस पर उसे आपत्ति हो । वे अपनी इच्छानुसार मतदान नहीं कर सकते थे और जो सोचते थे वह बोल नहीं सकते थे। वे वहां बेजुबान नाके हुए मवेशियों की तरह थी। अछूतों के लिए विधायिका में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने का एक उद्देश्य उन्हें इस योग्य बनाना है कि वे अपनी शिकायतों को व्यक्त कर सकें और  गलतियों को सुधार सकें। कांग्रेस ऐसा न होने देने के अपने प्रयासों में सफल और कारगर रही l
“इस लंबी और दुखद कहानी का अंत करने के लिए कांग्रेस ने पूना समझौते का रस चूस लिया और छिलका अछूतों के मुंह पर फेंक दिया।” -डॉ. बी.आर. आंबेडकर
अनुसूचित जातियों के विधायकों की असहायता का वर्णन डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स” में किया है। यह स्थिति 1945 में थी। आने वाले वर्षों में, हमें और भी खराब हालात और भी बड़े पैमाने पर देखने को मिले। उस समय इस तरह का व्यवहार करने और अनुसूचित जातियों में से चमचे बनाने वाली ऊंची जातियों के हिंदुओं की राष्ट्रीय स्तर पर 7 पार्टियां और राज्य तथा क्षेत्रीय स्तर की अनेक पार्टियां हैं जो केवल अनुसूचित जातियों से ही नहीं बल्कि भारत के सभी उत्पीड़ित और शोषित समुदायों से चमचे पैदा कर रही हैं। आज ऊंची जातियों के हिंदुओं की ये सभी पार्टियां रस चूस रही हैं और छिलका उन 85% उत्पीड़ित और शोषित भारतीयों के मुंह पर फेंक रही हैं।
इस प्रकार, विभिन्न दलों में चमचों के इस निर्माण ने हमारे लिए हालात और भी बदतर कर दिए हैं। जो लोग समस्या से निपटना चाहते हैं वे अपने सामने खड़ी और भी बड़ी समस्या के इस पहलू को अनदेखा नहीं कर सकते।
प्रदीप बैरवा
साभार – चमचा युग

बाबरी मस्जिद का फैसला – न्याय प्रणाली की कसौटी पर उठते सवाल – भगवा राज में किस ओर जा रहा हैं देश

 तो फिर बाबरी मस्जिद ढांचा किसने तोडा – बड़ा सवाल ……………….राम रथ यात्रा का उदेश्य क्या था ……….देश को पूछता हैं  आडवानी जी  
यह सार्वभौमिक सत्य है की अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को तोड़कर गिराया गया था, इसे गिराने का आरोप कार सेवकों जो कि भाजपा , विश्व हिंदू परिषद , बजरंग दल ,RSS के ख्यातनाम चेहरों पर लगे हैं , आंदोलन करने वाले कारसेवकों के हुजूम का नेतृत्व कर रहे थे , उनमें मुख्य चेहरा थे लालकृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, अशोक सिंघल, आदि
इस फैसले में सभी कारसेवकों और नेतृत्व करता सभी नेताओं को बरी कर दिया, यह भी सत्य है नेतृत्व करता जिन नेताओं पर मस्जिद को गिराने का आरोप लगा है उनके स्वयं के द्वारा एक टुकड़ा भी नहीं तोड़ा गया, लेकिन जिन कारसेवकों के हुजूम का नेतृत्व अयोध्या में इन नेताओं द्वारा किया गया था, क्या उसे प्रदर्शन का कोई एजेंडा नहीं था, आखिरकार सेवक अयोध्या इसीलिए तो गए थे कि वहां पहुंचकर बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया जायें , तो क्या यह सत्य नहीं है की मस्जिद गिराने के लिए प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले हिंदू समर्थक नेताओं की जिम्मेदारी से कैसे इंकार किया जा सकता है, यह अलग बात है उसी स्थान को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मंदिर के पक्ष में फैसला दे दिया गया, फैसला भी एक प्रकार से हिंदू और मुस्लिम संप्रदाय के लिए एडजस्टमेंट करने जैसा ही था, अर्थात दोनों ही वर्ग को संतुष्ट करने का उद्देश्य, लेकिन यह मसला बाबरी मस्जिद का है, अयोध्या में बाबरी मस्जिद थी, कारसेवक वहां पहुंचे हैं, कारसेवकों का एजेंडा मस्जिद को गिराना था, कार सेवकों का नेतृत्व जिन नेताओं द्वारा किया जा रहा था, मस्जिद गिराने की जिम्मेदारी से उन्हें हरगिज दोषमुक्त नहीं किया जा सकता है, हो सकता है, क्योंकि तत्कालीन समय लालकृष्ण आडवाणी द्वारा उनके राम रथ पर सवार होकर हिंदू समाज को किसी खास मुद्दे को लेकर उकसाना, उद्वेलित करना, केवल हिंदुओं को जगाने का तो नहीं था, इसके पीछे वास्तविक उद्देश्य मस्जिद को गिरा ना ही था,
इस फैसले से मुस्लिम समाज का आक्रोशित होना वाजिब कहा जा सकता है कि आखिर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन प्रशासन सरकार, और केंद्र के तमाम जांच एजेंसियों के सक्रिय रहने के बाद भी, जो लोग मस्जिद ढहाने के दोषी थे, आखिर पकड़े क्यों नहीं गए, इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या इस प्रकरण में फिर से कोई नई जांच खोलकर दोषियों को खोजने का काम प्रारंभ किया जाएगा ? यदि ऐसा संभव नहीं हो पाता है तो, तत्कालीन सरकार, उसके दिन तमाम जांच एजेंसियां, केंद्र सरकार की जांच एजेंसियां, जिन पर बाबरी मस्जिद को बचाने की जिम्मेदारी रहते हुए गिरा दी गई क्यों और कैसे क्या इन प्रश्नों के उत्तर इस फैसले में है?
             
लेखक –  मोहन लाल बैरवा
               
सोशल एक्टिविस्ट एवं TV- डिबेटर, जयपुर

आपका ज़मीर आख़िर जिन्दा क्यों है – 21 वीं सदीं में इंसान मलमूत्र में अपना मुहँ दे रहा है

Why is your conscience alive – in the 21st century man is giving his mouth in excreta

राजस्थान . जयपुर | भारत देश आज परमाणु सम्पन्न है और विश्व पटल पर अपनी एक साख रखता है लेकिन जमीनी स्तर पर आज भी कुछ ऐसे अमानवीय द्रश्य हमारी आखों के सामने आ जाते है की हम अपने आप से ही कई सवाल कर बैठते थे आख़िर ऐसा क्यों – आज़ादी के 70 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हमारे समाज के कर्णधार समाज ” वाल्मीकि ” जिन्हें अलग – अलग राज्यों में अलग -अलग नाम से जानते है जैसे राजस्थान में में वाल्मीकि .भंगी .मेहतर .झडमाली . हलालखोर . चुह्दा ,राउत ,हेमा . डोम .डोमर .हाड़ी ,लालबेग आदी तमाम नाम लेकिन इनका काम सिर्फ – सफाई करना है चाहे रोड पर हो या गटर – सीवरेज |

आज़ादी के बाद इस वंचित समाज को क्या मिला –

भारत देश 15 अगस्त 1947 में आज़ाद हो गया देश की सत्ता अब देश के नेताओं के पास आ गई देश के पहले प्रधानमंत्री बनने का गौरव पंडित जवाहर लाल नेहरु को मिला ,उनका पहला देश को संबोधित करने वाला भाषाण एक विजनरी था जिसकी चर्चा आज भी होती है | देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी और 26 जनवरी 1950 को डॉ बाबा साहब अम्बेडकर के अध्यक्ष्यता में ” भारत के संविधान का निर्माण हुआ और लागू हुआ जिसके अंतर्गत देश के सभी व्यक्तियों को सामाजिक ,आर्थिक और राजनेतिक न्याय ,विचार अभिव्यति , धर्म , प्रतिष्टा ,अवसर की समानता आदी अधिकार मिले लेकिन यह वाल्मीकि समाज के लियें उधार सा प्रतीत हो रहा है आज भी |

sabir kureshi pic – shashtri nagar . jaipur .

लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भारी – सामाजिक व्यवस्था

भारत देश में एक अभिशाप व्यवस्था है जिसे वर्ण व्यवस्था कहते है इस व्यवस्था ने वंचित वर्ग की जातियों को अद्रश्य गुलामी की बेड़ियों में इस कदर जकड़ रखा हैं की संवेधानिक रूप से SC जातिया जिन्हें अनुसूचित जातियों की श्रेणी में रखा गया है इनका जीवन आज भी चौनोतीपूर्ण है जैसे – वाल्मीकि , रेगर , बलाई ,चमार ,मेघवाल ,खटिक, बैरवा ,आदी इन जातियों का जीवन आज भी संवेधानिक अधिकार होने के बावजूद भी प्रतिदिन अपने स्वाभिमान के लियें संघर्ष करती नज़र आती है आज भी इन्हें अपनी शादी में घोड़ी पर नहीं बैठने दिया जाता , मूंछ नहीं रखने दिया जाता , आज भी इन जातियों को छुआ -छुत का शिकार होना पड़ता है जहाँ ग्रामीण क्षेत्रो में यह प्रत्यश होता है तो शहरी क्षेत्रो शाररिक कम और मानसिक छुआ छुत अधिक होने लगी है जबकि सरकार ने इन वंचित समाज की सुरक्षा के लियें ” SC/ST ACT – 1989 बना रखा है फिर भी असामाजिक लोगों द्वारा इन गरीब वंचित लोगो का शोषण करते रहते है जैसे – राजस्थान में डांगावास कांड , नागौर – पेचकस कांड ,अलवर कांड ,सीकर आदी तमाम जघन्य अपराध राजस्थान के इतिहास में दर्ज है – वैसे राजस्थान दलितों पर हत्याचार के मामले में प्रथम स्थान पर है जो की राज्य के लियें – शर्मनाक है |

सीवरेज वर्कर को लेकर लम्बे समय से काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता हेमलता कांसोटिया ने कहा की –

आज भी वाल्मीकि समाज के लोगों को समाज में सम्मानजनक काम अन्य जातियों द्वारा नहीं करने दिया जाता उनका विभिन्न तरिकों से बहिष्कार किया जाता हैं क्या आप ने अभी तक “वाल्मीकि मिष्ठान भण्डार , भंगी पवित्र भोजनालय , चमार फुटवियर , रेगर महाविधालय देखा है नहीं देखा होगा जबकि – शर्मा पवित्र भोजनालय आप ने अधिकतर हर जगह देखा होगा , शर्मा फुटवियर भी नहीं देखा होगा जबकि यही अंतर है उच्च जाती व् दलित जातियों में |

जब व्यक्ति को उचित काम नहीं मिलेगा तो वह मज़बूरी के कारण मलमूत्र में मुहँ देने को मजबूर है क्योकि उसे अपने बच्चे ,परिवार जो पालना है

उच्च न्यायलय ने सीवरेज वर्कर को लेकर 2005 में में दिशा – निर्देश दियें थे की सीवरेज से संबंधित सभी कार्य मशीनों के माध्यम से होगा लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं आया |

में { हेमलता कांसोटिया } ने 2007 में दिल्ली उच्च न्यायलय में सीवरेज वर्कर को लेकर जनहित याचिका डाली गई जिसके परिणाम स्वरूप 2008 में दिल्ली न्यायलय व् सर्वोच्च न्यायलय द्वारा ने सीवरेज लाइन में व्यक्ति को उतरने पर पाबंदी लगा दी गई और सभी राज्यों को आदेश प्रेषित कर दियें . लेकिन आज भी सीवरेज वर्कर की स्थिति वही है की उसे आज भी अन्य व्यक्तियों के मलमूत्र में मुहँ देना पड़ रहा है | अब तो राज्यों सरकारों को इस अमानवीय काम पर पूर्ण रूप से रोक लगाना चाहियें और साथ ही सीवरेज वर्कर को सभी जरुरी सुरक्षा उपकरण देकर मशीनों की सहायता से काम किया जायें |

गाँधी जी 150 वीं वर्ष जयंती और वाल्मीकि समाज –

महात्मा गांधी और दलित समाज –

आजादी के समय से पूर्व ही महात्मा गाँधी दलित समाज और विशेष वाल्मीकि समाज के उद्धार के लियें काम कर रहे थे और उस वक्त सम्पूर्ण देश व् कांग्रेस पार्टी में गाँधी का विशेष स्थान था लेकिन जमीनी स्तर पर जबकि लगभग 100 साल से अधिक समय बीत चूका है लेकिन इस दलित समाज का विकास नहीं हो पाया और यह समाज आज भी मलमूत्र में मुहँ देने को मजबूर है

अब देश महात्मा गांधी की वर्ष भर 150 वीं जयंती मना रही है तो क्या महात्मा गाँधी को आदर्श मानने वाले बड़े नेता प्रधानमंत्री मोदी ,मुख्यमंत्री अशोक गहलोत क्या इन दलित समाज के लोगों को इस अमानवीय काम से दूर नहीं कर सकते क्या यह महात्मा गांधी व् डॉ अम्बेडकर को सच्चा सम्मान नहीं दे सकते

 

story by – pawan dev 

{ news team – politico }

क्या भारत में मोदी { पूंजीवाद } के खिलाफ़ – लाल सलाम { कार्ल मार्क्स & लेनिन } क्रांती की आहट शुरू हो चुकी है ,जानें यहाँ

Has the cry for Lal Salaam {Karl Marx & Lenin} revolution started against Modi {capitalism} in India, know here

The basic lessons of Lenin are still the same, right and very important today –

श्रमजीवी वर्ग के महान क्रांतिकारी नेता और शिक्षक, वी.आई. लेनिन रूस के मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय को संगठित करके पूंजीपतियों का तख्तापलट करने, और मानव इतिहास में पहली बार मजदूरों और किसानों की हुकूमत स्थापित व मजबूत करने में बोल्शेविक पार्टी को अगुवाई दी।

अपनी महत्पूर्ण सैद्धांतिक कृति “साम्राज्यवाद: पूंजीवाद का उच्चतम पड़ाव” में लेनिन ने दिखाया कि पूंजीवाद अपने अंतिम पड़ाव,

साम्राज्यवाद या मरणासन्न पूंजीवाद, पर पहुंच गया है।

दुनिया और भारत में सारी गतिविधियां वर्तमान युग को साम्राज्यवाद और श्रमजीवी क्रांति का युग बताने वाले लेनिन के विश्लेषण की ही पुष्टि करती हैं। साम्राज्यवाद दुनिया के सभी भागों पर अपना वर्चस्व जमाने के लिये पूरी कोशिश करेगा, खूनी विनाशकारी जंग भी छेड़ेगा, और मानवजाति को एक संकट से दूसरे संकट में धकेलता चला जायेगा, जब तक मजदूर वर्ग इस शोषण की व्यवस्था का तख्तापलट करने और समाजवाद लाने के संघर्ष में शोषित व उत्पीड़ित जनसमुदाय को अगुवाई नहीं देगा।

 

कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने मानव समाज के विकास के वैज्ञानिक विश्लेषण के ज़रिये यह स्थापित किया था कि पूंजीवाद की कब्र खोदना और इंसान द्वारा इंसान के शोषण से मुक्त समाजवाद और कम्युनिज़्म का नया युग लाना मजदूर वर्ग का अन्तिम लक्ष्य है। लेनिन अपने समय की हालतों में, जब पूंजीवाद साम्राज्यवाद के पड़ाव पर पहुंच गया था, मार्क्सवाद के सिद्धांत की हिफाज़त की, उसे लागू किया और विकसित भी।
लेनिन ने दिखाया कि जब पूंजीवाद साम्राज्यवाद के पड़ाव पर पहुंच जाता है, तो श्रमजीवी क्रांति के लिए सभी हालतें परिपक्व हो जाती हैं। उन्होंने असमान आर्थिक और राजनीतिक विकास के नियम का आविष्कार किये और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अंतर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोधों, शोषकों और शोषितों के बीच अंतर्विरोधों, दूसरों पर हावी साम्राज्यवादी राज्यों और दबे

-कुचले राष्ट्रों तथा लोगों के बीच अंतर्विरोधों, इन सबकी वजह से यह मुमकिन हो जाता है कि किसी एक देश में क्रांति शुरू हो सकती और कामयाब हो सकती है। इससे पहले सोचा जाता था कि श्रमजीवी क्रांति सिर्फ उन देशों में शुरू हो सकती है जहां पूंजीवाद सबसे अगुवा था। लेनिन ने यह पूर्वाभास दिया कि क्रांति उस देश में शुरू होगी जहां साम्राज्यवाद की वैश्विक कड़ी सबसे कमजोर होगी, हालांकि वह देश पूंजीवादी तौर पर अगुवा नहिं भी हो सकता है, क्योंकि साम्राज्यवाद गुलामी और लूट की वैश्विक व्यवस्था है। लेनिन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि साम्राज्यवाद श्रमजीवी क्रांति की पूर्वसंध्या है।

1917 में रूस में अक्तूबर क्रांति की जीत के साथ दुनिया के इतिहास में एक नया युग शुरू हुआ। पहली बार, शोषक वर्ग की राजनीतिक सत्ता को मिटाया गया और उसकी जगह पर किसी दूसरे शोषक वर्ग की सत्ता नहीं, बल्कि मजदूर वर्ग की सत्ता स्थापित हुई। दुनियाभर में कई पीढ़ियों के कम्युनिस्ट और क्रांतिकारी उस समय से, शोषण के खिलाफ़ अपने संघर्ष में लेनिनवाद के सिद्धांत और अभ्यास से प्रेरित और मार्गदर्शित हुए।

लेनिन ने मार्क्स की धारणा का विस्तार किये कि श्रमजीवी क्रांति से समाजवाद स्थापित करने के लिए श्रमजीवी अधिना

यकत्व के राज्य की स्थापना करना आवश्यक है, जो कि समाज को समाजवाद और कम्युनिज़्म के रास्ते पर अगुवाई देने के लिए मजदूर वर्ग का मुख्य साधन है। रूस में 1917 में महान अक्तूबर समाजवादी क्रांति की जीत और सोवियत संघ में समाजवाद के निर्माण से यह अवधारणा सही साबित हुई। लेनिन और स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ में समाजवाद का सफलतापूर्वक निर्माण उन हालतों में किया गया जब दुनिया की मुख्य साम्राज्यवादी ताकतें और सत्ता से गिराये गये प्रतिक्रियावादी मिलजुलकर, सशस्त्र हमले और अंदरूनी विनाश के ज़रिये क्रांति को कुचलने की भरसक कोशिश कर रहे थे और सोवियत संघ के मजदूर-मेहनतकशों को इन कोशिशों के खिलाफ़ डटकर संघर्ष भी करना पड़ रहा था, जिसमें वे सफल हुए। जिन देशों में श्रमजीवी अधिनायकत्व को नहीं स्थापित किया गया, जैसे कि चीन, वहां के विपरीत घटनाक्रम से भी लेनिन की अवधारणा सही साबित होती है।

 

जे.वी. स्टालिन ने लेनिनवाद को आमतौर पर श्रमजीवी क्रांति का सिद्धांत और कार्यनीति तथा खासतौर

पर श्रमजीवी अधिनायकत्व का सिद्धांत और कार्यनीति बताया।

लेनिन ने उन सभी के खिलाफ़ कठोर विचारधारात्मक संघर्ष किया, जो पार्टी को समान विचार वाले सदस्यों की ढुलमुल संस्था के रूप में बनाना चाहते थे। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूंजीपति वर्ग को हराने के लिए मजदूर वर्ग के अंदर जिस अटूट एकता की जरूरत है, उसे हासिल करने के लिए यह काफी नहीं है कि पार्टी के सदस्य पार्टी के कार्यक्रम से सहमत हों और नियमित तौर पर योगदान दें; पार्टी के सदस्यों को पार्टी के किसी संगठन के अनुशासन तले काम भी करना होगा। उन्होंने लोकतांत्रिक केन्द्रीयवाद – सामूहिक फैसले लेना और व्यक्तिगत दायित्व निभाना – को कम्युनिस्ट पार्टी के संगठनात्मक सिद्धांत बतौर स्थापित किया, जिसके ज़रिये अधिक से अधिक व्यक्तिगत पहल उभरकर आती है और साथ ही साथ, पार्टी की एकाश्म एकता हमेशा बनी रहती है तथा मजबूत होती रहती है।

विभिन्न ताकतों द्वारा मार्क्सवाद को तोड़-मरोड़कर और झूठे तरीके से पेश करने की कोशिशों के खिलाफ़ लेनिन ने मार्क्सवाद के मूल सिद्धांतों का अनुमोदन और हिफ़ाज़त करने के लिए जो कठोर संघर्ष किया था, वह उस अवधि में उनके द्वारा लिखे गये महत्वपूर्ण लेखों से स्पष्ट होता है। अपनी कृति “राज्य और क्रांति” में लेनिन ने मार्क्सवाद और एंगेल्स की उस मूल अवधारणा की हिफ़ाज़त की कि श्रमजीवी वर्ग के लिए यह जरूरी है कि पूंजीवादी राज्य तंत्र को चकनाचूर कर दिया जाये और उसकी जगह पर एक बिल्कुल नया राज्यतंत्र स्थापित किया जाये जो मजदूर वर्ग की सेवा में काम करेगा। अपनी कृति “

श्रमजीवी क्रांति और विश्वासघातक काउत्स्की” में लेनिन ने पूंजीवादी लोकतंत्र के बारे में मजदूर वर्ग आंदोलन में भ्रम फैलाने की कोशिशों का पर्दाफाश किया और श्रमजीवी अधिनायकत्व के तहत श्रमजीवी लोकतंत्र के साथ पूंजीवादी लोकतंत्र की बड़ी तीक्ष्णता से तुलना की।

आज दुनिया के अलग भागों में मजदूर वर्ग और दूसरे उत्पीड़ित तबकों द्वारा अपने-अपने पूंजीवादी शासकों और साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ़ संघर्ष आगे बढा रहे हैं। साम्राज्यवाद और पूंजीपति गहरे से गहरे संकट में फंसते चले जा रहे हैं।
ब्रिटेन-अमेरीकी साम्राज्यवादी अपने वर्चस्व को बनाये रखने तथा अपने प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करने के लिए, एक के बाद दूसरा विनाशकारी जंग छेड़ रहे हैं और राष्ट्रों तथा लोगों की आज़ादी और संप्रभुता पर बेरहमी से हमले कर रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में झूठा प्रचार करके वे साम्राज्यवादियों के खिलाफ़ खड़े होने की जुर्रत करने वालों को आतंकवादी और दुष्ट राज्य करार देते हैं, और फिर उन पर क्रूर बल-प्रयोग को जायज़ ठहराते हैं।

सारी दुनिया में साम्राज्यवादी जंग और लूट के खिलाफ़ संघर्ष भी तेज़ हो रहा है। पूंजीवादी देशों में शोषकों और शोषितों के बीच अंतर्विरोध, साम्राज्यवाद और दबे-कुचले राष्ट्रों व लोगों के बीच अंतर्विरोध और अंतर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोध, सभी तीक्ष्ण होते चले जा रहे हैं। इन सबसे लेनिन के मूल सबकों और निष्कर्षों की फिर से पुष्टि होती है। सभी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों का यह काम है कि मजदूर वर्ग को श्रमजीवी क्रांति के दूसरे दौर के लिए तैयार करें, जिसका साम्राज्यवादी कड़़ी के सबसे कमजोर स्थान पर शुरू होना लाजिमी है।

लेनिनवाद को तोड़-मरोड़कर पेश करने और उसे कोई ऐसा सिद्धांत बना देने, जो पूंजीपतियों को कोई नुकसान न पहुंचाये, इन सभी कोशिशों के खिलाफ़ लेनिनवाद के मूल निष्कर्षों की हिफ़ाज़त करने के लिए भारत की कम्युनिस्ट पार्टीयाँ भी लगातार संघर्ष करती आयी है। हमें ‘समाजवाद के संसदीय रास्ते’ के खिलाफ़ संघर्ष करना होगा और करते जा रहे हैं भी। हमने डटकर उस धारणा का भी विरोध किया है कि इस समय श्रमजीवी क्रांति मुमकिन ही नहीं है या इसकी जरूरत नहीं है। ऐसी धारणाएं इसलिए फैलायी जाती हैं ताकि साम्राज्यवाद और पूंजीपतियों के साथ समझौता करना जायज़ ठहराया जा सके। यह धारणा जो आज बहुत फैलायी जा रही है, कि आज कोई ‘मध्यम वर्ग की क्रांति’ मुमकिन है न कि श्रमजीवी क्रांति, इसके खिलाफ़ हमें डटकर संघर्ष करना पड़ेगा।

कुछ ताकतें एक एकजुट वैश्विक ताकत बतौर “अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी” की बात करती हैं और इस तरह दुनिया पर हावी होने के लिए विभिन्न साम्राज्यवादी ताकतों के आपसी अंतर्विरोधों को कम करके पेश करती हैं। वे भी लेनिनवाद के मूल निष्कर्षों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। उनके द्वारा फैलायी गई इस सोच के अनुसार दुश्मन की ताकत को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और क्रांति की संभावनाओं का अल्पानुमान किया जाता है।

आज साम्राज्यवाद और श्रमजीवी क्रांति का ही युग चल रहा है, जिसके अंदर सोवियत संघ के विघटन के बाद क्रांति की लहर कुछ समय के लिए पीछे चली गई है। कामरेड लेनिन के सबक आज बहुत महत्व रखते हैं।

मार्क्सवाद-लेनिनवाद के मूल असूलों और निष्कर्षों की हिफ़ाज़त करने और इन असूलों व निष्कर्षों के अनुकूल हिन्दोस्तानी लोगों की मुक्ति के सिद्धांत को विकसित करने को हमें वचनबद्ध होना है। हमारे सामने फौरी कार्य मजदूर वर्ग, मेहनतकश किसानों तथा दूसरे उत्पीड़ित तबकों के साथ गठबंधन बनाकर, अपने हाथ में राज्य सत्ता लेने के लिए तैयार करना है।

पूंजीपतियों के परजीवी शासन को खत्म करने और मेहनतकश जनता का उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए यह अनिवार्य शर्त है। (कॉपी & ओवर राइट)

लेख़क -प्रतिवादी नवीन

क्या असदुद्दीन ओवैसी देश में मुसलमानों के लियें उपयुक्त है – ओवैसी परिवार -इतिहास यहाँ जानें

ओवैसी मुल्क और मुसलमानों के लिए फायदेमंद हैं या नुकसानदेह  –
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असदुद्दीन ओवैसी जो कि एमआईएम के सदर और हैदराबाद लोकसभा सीट से सांसद हैं। जिनको लेकर आजकल मुस्लिम कौम में जबरदस्त उत्साह है। काफी मुसलमान उन्हें अपना सियासी रहनुमा मान रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ बहुत से लोग ख़ासकर तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों से जुड़े हुए लोग उन्हें भाजपा को लाभ पहुंचाने वाला बता रहे हैं। इसी उत्साह और आरोप को मद्देनजर रखकर यह लेख तैयार किया गया है। इसे पूरा पढेंगे तभी समझ में आएगा कि ओवैसी साहब मुल्क और मुसलमानों के लिए फायदेमंद हैं या नुकसानदेह ?
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जयपुर । ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहाद उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) जिसे मजलिस और एमआईएम भी कहा जाता है। जो कि एक सियासी पार्टी है। बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी इसके अध्यक्ष (सदर) हैं और वे हैदराबाद लोकसभा सीट से सांसद हैं। ओवैसी और इनकी पार्टी सियासी गलियारों में कुछ बरसों से चर्चा का विषय बनी हुई है। बेबाक और सटीक भाषण तथा संघ परिवार एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खरी खौटी सुनाने के मामले में ओवैसी मशहूर हैं। आजकल उनको लेकर मुस्लिम कौम में जबरदस्त उत्साह

असदुद्दीन ओवैसी

का माहौल है, उन्हें बहुत से मुसलमान अपना सियासी रहनुमा मान रहे हैं। वहीं उनकी आलोचना भी जमकर हो रही है। 

उनके समर्थन और विरोध में सबकी अपनी अपनी दलीलें हैं। लेकिन सच यह है कि मिस्टर ओवैसी को लेकर देशभर की उच्च सियासी चौपालों से लेकर गली नुक्कड़ की चाय चौपालों तक आजकल चर्चा होती है। कोई उन्हें मुल्क और मुसलमानों के लिए फायदेमंद बताता है, तो कोई नुकसानदेह। हम इस लेख में न यह बताना चाहते कि ओवैसी ने कहाँ कहाँ से अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारे और ना ही यह बताना चाहते हैं कि उन्होंने कितने कितने वोट लिए तथा उनकी वजह से किसको फायदा हुआ और किसको नुकसान। हम सिर्फ इस सवाल का जवाब तलाशना चाहते हैं कि ओवैसी साहब मुल्क और मुसलमानों के लिए फायदेमंद हैं या नुकसानदेह ?

इस सवाल के जवाब से पहले ओवैसी साहब की पार्टी की तारीख (इतिहास) पर थोड़ी नजर डाल लें, तो अच्छा रहेगा ताकि मुद्दा कहीं से अधूरा नजर नहीं आए। मजलिस ए इत्तेहाद उल मुस्लिमीन (एमआईएम) नामक संगठन की स्थापना 12 नवम्बर 1927 को ब्रिटिश भारत की हैदराबाद स्टेट में हुई थी। इसकी स्थापना नवाब महमूद खान के हाथों हुई थी और इसकी स्थापना में हैदराबाद के मशहूर राजनेता सय्यद कासिम रिजवी की अहम भूमिका थी। कासिम रिजवी रजाकार नामक हथियारबन्द संगठन के नेता थे। मजलिस और रजाकार संगठन एक ही थे, जो हैदराबाद स्टेट को एक आजाद राज्य बनाए रखने के हिमायती थे।

आजादी के बाद जब हैदराबाद का भारत संघ में विलय नहीं हुआ, तो भारत सरकार ने फौजी कार्रवाई की। इस भिड़ंत में हैदराबाद स्टेट की फौज, रजाकार संगठन के हथियारबन्द लोगों और भारतीय फौज के बीच जमकर खून खराबा हुआ। इस जंग में हैदराबाद निजाम और रजाकारों की हार हुई तथा हैदराबाद स्टेट का भारतीय संघ विलय हुआ। सय्यद कासिम रिजवी जो कि तब मजलिस के सदर थे, उनको गिरफ्तार कर लिया गया। फिर वे पाकिस्तान चले गए। भारत सरकार ने मजलिस को प्रतिबंधित कर दिया। मजलिस को खड़ा करने में रजाकारों का प्रमुख योगदान था। इसलिए इस प्रतिबंध के साथ मजलिस और रजाकार संगठन दोनों एक तरह से खत्म हो गए।

इस तरह मजलिस का इतिहास दो भागों में है। एक 1927 से लेकर 1948 तक का और दूसरा 1957 में प्रतिबंध हटने के बाद का। भारत सरकार ने 1957 में मजलिस से प्रतिबंध हटा लिया। मजलिस ने अपने नाम और संविधान में बदलाव कर लिया। मजलिस ने अपना नाम ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहाद उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) कर लिया। यानी नाम की शुरुआत में ऑल इंडिया जोड़ लिया। पाकिस्तान जाने से पहले सय्यद कासिम रिजवी ने मजलिस की कमान हैदराबाद के मशहूर वकील अब्दुल वहीद ओवैसी को सौंप दी थी। असदुद्दीन औवेसी इन्हीं अब्दुल वहीद ओवैसी के पोते हैं।

1957 से मजलिस (एमआईएम) पूरी तरह से ओवैसी खानदान की कमान में है। अब्दुल वहीद ओवैसी के बाद सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी इसके अध्यक्ष बने। जिन्हें सालार ए मिल्लत भी कहा जाता है। मजलिस को चुनावी कामयाबी 1960 में मिली, जब सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए। इसके दो साल बाद वे हैदराबाद से विधायक बने। सलाहुद्दीन ओवैसी 1984 में पहली बार हैदराबाद लोकसभा सीट से संसद में पहुंचे। तब से 2004 तक लगातार वे यहाँ से 6 बार सांसद रहे। वे मुस्लिम आरक्षण के हिमायती थे और 29 सितम्बर 2008 में उनका इन्तकाल हो गया।

सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी के बाद उनके पुत्र असदुद्दीन औवेसी मजलिस के सदर बने। असदुद्दीन ओवैसी एक बेबाक और सुलझे हुए वक्ता हैं। वे दीनी (इस्लाम की जानकारी) और दुनियावी तालीम में माहिर हैं। वे एक बैरिस्टर हैं और 25 साल की उम्र में 1994 में वे हैदराबाद की चार मीनार विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। असदुद्दीन औवेसी 2004 में हैदराबाद लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। तब से लगातार इस सीट से सांसद हैं। यानी 1994 से लेकर आज तक वे किसी चुनाव में नहीं हारे, चाहे वो विधानसभा का हो या लोकसभा का। उनके छोटे भाई अकबरूद्दीन ओवैसी विधायक हैं। जो भड़काऊ बयान के लिए भी मशहूर हैं।

 

मजलिस का कांग्रेस, टीडीपी, टीआरएस, वीबीए आदि पार्टियों से गठबंधन भी रहा है। कांग्रेस के समर्थन से मजलिस ने हैदराबाद नगर निगम का मेयर भी बनाया था और यूपीए सरकार का हिस्सा भी रही थी। लेकिन आज कांग्रेस के लिए मजलिस एक अछूत पार्टी बन गई, वजह चाहे जो भी हो। इस वक्त मजलिस के दो लोकसभा सांसद और तेलंगाना, महाराष्ट्र एवं बिहार में विधायक हैं। मजलिस की तारीख और सियासी उठाव के बाद चर्चा करें असल मुद्दे की। ओवैसी मुल्क और मुसलमानों के लिए फायदेमंद हैं या नुकसानदेह ? एक राजनेता या व्यक्तिगत तौर पर वे एक भले शख्स नजर आते हैं। लोग उनके दीवाने भी हैं, खासकर मुस्लिम यूथ। लेकिन एक राजनेता की व्यक्तिगत कितनी भी अच्छाइयां हों, जब तक उसके किए कामों, उसकी विचारधारा और उसके सियासी दांव का मुतआला (अध्ययन) गहराई से नहीं किया जाए, तब तक उसके नफे नुकसान सामने नहीं आते हैं।

वे अपनी पार्टी का किससे गठबंधन करते हैं और किस राज्य से उम्मीदवार उतारते हैं, यह उनका खुद की सियासत के नफे नुकसान पर और खुद की मर्जी से तय होता है। उसी तरह जिस तरह से राहुल गांधी, मायावती, अखिलेश यादव, नीतीश कुमार आदि राजनेता तय करते हैं। कौन किसके वोट काट रहा है और कौन किसको पर्दे के पीछे से चुनाव जीता रहा है ? यह भी कोई बड़ा सवाल नहीं है। क्योंकि अधिकतर राजनेता यह खेल खेलते हैं। हम सबसे पहले बात करते हैं आन्तरिक लोकतंत्र की, तो बहुत सी पार्टियों की तरह मजलिस में भी आन्तरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है। वहाँ भी सिर्फ एक खानदान यानी ओवैसी खानदान की चलती है। यह तरीका लोकतंत्र और मुल्क के लिए फायदेमंद नहीं है। इसी वजह से बरसों पहले हैदराबाद में मजलिस बचाओ तहरीक भी शुरू हुई थी, जो आज भी चल रही है।

दूसरी बात यह है कि हमारे मुल्क की असल ताकत गंगा जमुनी तहजीब यानी मिलीजुली संस्कृति है और उसके लिए जाति, पंथ वगैरह के नाम पर की गई सियासत और बनाई गई सियासी पार्टियां खतरा हैं। मुल्क को आज एक ऐसी सियासी पार्टी की जरूरत है, जिसमें आन्तरिक लोकतंत्र हो, जो जाति व पंथ के बजाए संवैधानिक मूल्यों एवं रोटी रोजगार के नाम की सियासत करे। तीसरी बात यह है कि ओवैसी साहब जिस अन्दाज़ में आज सक्रिय हैं, उस अन्दाज़ में 2012 से पहले भी सक्रिय थे क्या ? वे तब भी सांसद थे और 20 साल का राजनीतिक अनुभव रखते थे। जवाब है वे सिर्फ हैदराबाद में सक्रिय थे, बाकी देश में नहीं।

अब बात करते हैं मुस्लिम कौम से मुताल्लिक (सम्बंधित)। मुस्लिम कौम ने 1947 के देश विभाजन के बाद सबसे खतरनाक और दर्दनाक दौर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस और 2002 के गुजरात दंगों के दौरान देखा है। देश विभाजन और दंगों के खून खराबे के बीच भी भारतीय मुसलमान मजबूती से अपने मुल्क में एक अच्छी उम्मीद के साथ खड़ा था। क्योंकि गांधी, नेहरू, मौलाना आज़ाद और लोहिया जैसे नेताओं ने उन्हें यह अच्छी उम्मीद बंधवा रखी थी। लेकिन 1992 और 2002 में ऐसे नेताओं का अकाल पड़ चुका था तथा मायूस और मजलूम मुसलमानों को उम्मीद बंधवाने वाले राष्ट्रीय स्तर के ऐसे नेता देश में नहीं थे। क्या कोई बताएगा कि ओवैसी साहब के वालिद मोहतरम जो कि इन दोनों दर्दनाक मौकों पर सांसद थे, उन्होंने तब इस लाचार और बेबस कौम के आंसू पौंछने के लिए क्या किया ? आप जवाब तलाशते रहेंगे, लेकिन नहीं मिलेगा और जो मिलेगा उसको सुनकर आप हैरान हो जाएंगे।

मुस्लिम कौम का एक तबका ओवैसी साहब को एक मजबूत सियासी रहनुमा मान रहा है। चाहे मुद्दा तीन तलाक का हो या संघ परिवार को ललकारने का हो। ओवैसी साहब इन मामलों में बेबाकी से खुलकर बोलते हैं। लेकिन मुसलमानों के कुछ मुद्दे और भी हैं, जैसे विकास, वक्फ जायदाद की हिफाजत और आरक्षण। विकास पुराने हैदराबाद शहर को देखकर साफ नजर आ जाता है कि कितना हुआ है। यहाँ दशकों से सांसद, विधायक और नगर पार्षद उन्हीं की पार्टी के लोग हैं। जहाँ तक वक्फ जायदाद की हिफाजत की बात है, तो उसके लिए भी हैदराबाद गवाह है, ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है, वरना मज़मून और लम्बा हो जाएगा।

बात आरक्षण की करें, तो ओवैसी साहब यूपीए सरकार में दस साल शामिल रहे हैं। इस सरकार ने जस्टिस सच्चर कमेटी और जस्टिस मिश्रा कमिशन बनाया था। जिनकी सिफारिशें आज तक लागू नहीं हुई हैं। मिश्रा कमिशन ने अल्पसंख्यकों को विभिन्न कैटेगरी में 15 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की थी। यूपीए सरकार ने इस रिपोर्ट को सदन के पटल पर भी नहीं रखा। क्या कोई इस सवाल के जवाब की तलाश करेगा कि मिश्रा कमिशन की रिपोर्ट को सदन में रखने की मांग पर ओवैसी साहब ने सदन से कितनी बार वाॅक आउट किया या उस दौर में कितनी बार इस मांग को अवामी मंच से उठाया ? आरक्षण के मुद्दे पर ही एक बात और है। संसद में सांसद किसी मुद्दे पर निजी विधेयक (प्राइवेट मेम्बर बिल) रख सकता है। क्या ओवैसी साहब ने अल्पसंख्यक आरक्षण के मुद्दे पर ऐसा कोई निजी विधेयक संसद में रखा है ? इन सवालों के जवाब तलाशोगे तो आपको अजीबोगरीब कहानियां और मजबूरियाँ मिलेंगी।

आज संघ परिवार नफरत का जहर फैलाता हुआ केन्द्र की सत्ता में पूर्ण बहुमत से काबिज हो गया। जिसकी वजह यह है कि सामने कोई मजबूत और लोकतांत्रिक व्यवस्था वाली सियासी पार्टी नहीं है। जब ऐसी पार्टियां और मजबूत सुलझी हुई लीडरशिप थी, तब संघ परिवार की राजनीतिक शाखा भाजपा 200 सांसदों के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच पाई थी। अब अगर संघ परिवार को उसी की भाषा में जवाब देकर ललकारा जाएगा और उसके खिलाफ मुसलमानों को लामबन्द किया जाएगा, तो सबसे ज्यादा फायदा संघ का होगा और सबसे ज्यादा नुकसान मुल्क और मुसलमानों का होगा। चाहे ऐसा काम ओवैसी साहब करें या कोई दूसरा राजनेता करे।

आज देश में जो सियासी और नफरती माहौल बन रहा है या एक सोची समझी रणनीति के तहत बनाया जा रहा है, वो वैसा ही है जैसा 1940 में था। उस दौर की नफरती और खुदगर्ज़ सियासत ने मुल्क को मजहब की बुनियाद पर तक्सीम (विभाजित) कर दिया। जिसका सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम कौम को भुगतना पड़ा और आज भी भुगत रही है। जबकि देश विभाजन के समय कई कद्दावर राजनेता ऐसे थे, जिनका लोकतंत्र और भाईचारे में अटूट विश्वास था। वैसे राजनेताओं का आज तो पूरी तरह से अकाल पड़ चुका है। इसलिए आज अगर कोई राजनेता या राजनीतिक दल अपने मफाद के लिए मुल्क में जाति और पंथ की राजनीति कर रहे हैं, वो बड़ी घातक है और इस तरह की सियासत मुल्क को 1940 की दर्दनाक खाई की ओर धकेल देगी, जिसका खामियाजा सभी भारतीयों को भुगतना पड़ेगा |

लेख़क – एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।

पत्रकार अपनी विश्वसनियता बनाए रखें – रोहिताश सैन

हिंदी पत्रकार दिवस समारोह –

देहरादून । इंडियन मीडिया जर्नलिस्ट्स यूनियन के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और  वरिष्ठ पत्रकार रोहिताश सैन ने कहा है कि आज के समय में पत्रकारों के सामने अपनी विश्वसनियता को बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है और इस चुनौती का मुकाबला हम तभी कर सकेंगे जब हम अपने कार्य को पूजा समझ कर नहीं करेंगे। सैन ने यह बात गुरुवार को देहरादून जिले के डोईवाला विधानसभा मुख्यालय पर प्रगतिशील पत्रकार मंच द्वारा आयोजित हिंदी पत्रकार दिवस समारोह के मुख्य वक्ता के रूप में कही । उन्होंने वर्तमान समय में इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में पत्रकारिता पर विश्वसनीयता कम होने और आने वाले समय में इस चुनौती को दूर कर करने की बात कही । उन्होंने कहां की प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता आज भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की विश्वसनीयता के मुकाबले कहीं ज्यादा है ।

समारोह के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री के पूर्व सलाहकार व भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रकाश सुमन ध्यानी ने कहा कि वही पत्रकार महान बनते हैं जो चुनौतियों से पार पाकर आगे बढ़ते हैं उन्होंने पत्रकारिता के इतिहास को उदाहरण देते हुए सरलता से समझाया और बताया कि पत्रकारिता आदिकाल से अनेक रूपों से गुजरते हुए आज तक चली आ रही है ।

कार्यक्रम में बतौर विशिष्ट अतिथि मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार दर्शन सिंह रावत ने मीडिया कर्मियों के लिए सरकार की तरफ से दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में बताया और कहा कि प्रदेश सरकार पत्रकारों के समस्याओं से वाकिफ है और हम समस्याओं के निराकरण के लिए गंभीरता से प्रयास करेंगे कार्यक्रम को मुख्यमंत्री के जनसंपर्क अधिकारी शैलेंद्र त्यागी और आशीष डोभाल ने भी संबोधित किया नगर पालिका की अध्यक्षा सुमित्रा मंडवाल की अध्यक्षता रजनी सैनी के संचालन में चले कार्यक्रम में कांग्रेस के पंचायती राज संगठन के प्रदेश अध्यक्ष मोहित शर्मा ऋषिकेश से पत्रकार राजेश शर्मा दिनेश सजवान संपूर्णानंद थपलियाल एयरपोर्ट टर्मिनल मेनेजर सुमित सक्सैना एयरपोर्ट सिविल डिपार्टमेंट के एडीजीएम आरके गांधी अमित गुप्ता अश्वनी त्यागी आयोजन समिति से जुड़े संजय शर्मा ओंकार सिंह जावेद संजय राठौर चंद्रमोहन कोठियाल भाजपा नेता विक्रम नेगी विजय शर्मा राकेश नौटियाल मनीष यादव राहुल सैनी उम्मेद बोहरा सुनील बर्मन सागर मनवाल संपूर्ण रावत ओमप्रकाश कांबोज मनदीप बजाज हरीश कोठारी पुष्पराज बहुगुणा नवीन चौधरी दीपक सैनी अनूप रावत समेत अनेक लोग मौजूद थे

मातृशक्ति के अधिकारों , सशक्तिकरण ,और सम्मान के लियें संघर्षो के साथ लड़ते रहेंगे – पवन देव

 उदेश्य / विचार – राजनीति में सकारात्मक , ज्वलंत मुद्दों – रोजगार .एट्रोसिटी. महिला सुरक्षा.सामाजिक रूप

से समाज मे आपसी सौहार्द .राष्ट्रीय एकता. समानता बेहतर शिक्षा के लिये – युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित

करना ।

 

PAWAN DEV 

M – 7688827752 , 7976371944

MAIL – PAWANDEV024@GMAIL.COM

पवन देव का जन्म 24 जनवरी 1989 को राजस्थान के जयपुर शहर में हुआ इनके पिता का नाम पूरण मल एवं माता का नाम देवकी देवी है |

पवन देव का झुकाव बचपन से ही सामाजिक कार्यों व् समाज सेवा की ओर रहा , 16 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने मंडी – खटिकान , ईदगाह , चार दरवाजा क्षेत्र के गरीब , दलित ,मुस्लिम व् वंचित तबके के बच्चो को शिक्षा की और अग्रसर करने हेतू कार्य किया  , इसके लियें वह अपने स्वंम के स्कूल के समय को छोड़ कर बाकी समय इन बच्चो को शिक्षा की और अग्रसर करने में लगाया |

सामाजिक कार्यो में सक्रिय भूमिका –

VERTEX EDUCATIONAL FOR SOCIAL DEVELOPMENT SANSTHAN { JAIPUR }

पवन देव ने शिक्षा व् सामाजिक कार्यो के लीये अग्रणी संस्था  { वर्टेक्स एजुकेशनल  फॉर सोशल डेवलपमेंट संस्थान } से जुड़ कर जनसंपर्क पद कार्य करते हुयें , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बाल -विवाह रोकथाम , नशा मुक्त भारत , बाल मजदूरी – एक अभिशाप , महिला सशक्तिकरण , सामाजिक समानता , दहेज़ एक मानसिक बीमारी ,रक्तदान शिविर , पर्यवारण सुरक्षा – हमारी ज़िम्मेदारी , विवाह सम्मलेन आदी समाज से जुड़े मुद्दों पर काम किया व् लोगों को जागरूक किया व् निरंतर इस दिशा में प्रयास जारी है |

भीम संसद – 

पवन देव – भीम संसद संगठन में राष्टीय मीडिया प्रवक्ता के पद पर कार्य करते हुयें –

संविधान निर्माता डॉ बाबा साहब अम्बेडकर द्वार दियें गयें संवैधानिक / मूल अधिकारों के प्रति लोगों को जागरूक करना व्  मातृ शक्ति { महिलाओं } दलित , आदिवासी वंचित- शोषित व् अल्पसंख्यक वर्ग से आने वाले यूथ में लीडरशिप का विकास कर समतामूलक समाज का निर्माण करना  इसके लियें गाँव ,क़स्बे – ढाणी , जिला स्तर पर भीम संसद के सदस्यों के माध्यम से विचार गोष्टी – सम्मलेन आयोजन किया जा रहा है निरंतर |

राजस्थान दलित – मुस्लिम एकता मंच 

पवन देव – राजस्थान दलित मुस्लिम एकता मंच संगठन में राजस्थान मीडिया प्रभारी व् प्रवक्ता के पद कर कार्य कर रहे है 

देश में आपसी सोहार्द व्  भाईचारा कायम रहे है इसके लियें प्रबुद्ध समाज के गणमान्य लोगों ने इस संगठन का निर्माण किया है इसमें  युवा पत्रकार पवन देव  पधाधिकारी की ज़िम्मेदारी निभाते हुयें देश हित व् राष्ट निर्माण में युवाओं की भूमिका पर कार्य कर रहे है किसी भी अवांछित / अप्रिय घटना पर संगठन द्वारा पुलिस प्रशासन व् सामाजिक गणमान्य लोगो व् स्थानीय लोगो द्वारा समस्या की जड़ तक पहुँच कर दोनों पक्षों के पहलू ओं की जांच -पड़ताल कर उसका निराकरण कर ,शांति स्थापित कर स्वस्थ समाज का निर्माण करना संगठन की पहली प्राथमिकता है |

अखिल भारतीय परिसंघ में जयपुर शहर अध्यक्ष के पद मिली ज़िम्मेदारी

पूर्व सांसद उदित राज जी ने राजस्थान में अपने संगठन में युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने व् गरीब ,वंचित , पिछड़े वर्ग के विकास व् लीडरशिप विकसित करने के अपने प्रयासों में पवन देव को महत्वपूर्ण  ज़िमेदारी दी है पूर्व सांसद उदित राज जी के निर्देशानुसार पवन देव यूथ की समस्यों को लेकर काम कर रहे है इसके साथ ही अनुसूचित जाति / जन जाति संगठनो के एकीकरण व् कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों व समाज के विकास के लिये काम कर रहे है |

पत्रकारों के अधिकारों के लियें – संघर्ष व् कार्य –

RAJASTHAN WORKING MEDIA JOURNALISTS UNION – 

पत्रकारों के कल्याण व् उनके उत्थान के लियें अग्रणी संस्था { RAJASTHAN WORKING MEDIA JOURNALISTS UNION } में STATE COORDINETOR { स्टेट कोऑर्डिनेट } के पद कार्य करते हुयें साथी पत्रकारों के उन्नति के लियें कार्य –

पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करते हुयें साथी पत्रकारों के हक्क व् अधिकारों के लीये संघर्ष कर केंद्र व् राज्य सरकार से  व्  केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री महोदय व् राजस्थान की मुख्यमंत्री से मिल कर वर्किंग पत्रकारों की समस्या व् पत्रकारों की सुरक्षा के लियें कानून बनवाने का कार्य किया , जिसके फलस्वरूप राजस्थान सरकार ने वर्किंग पत्रकारों के केमरों व् अन्य उपकरणों का अपनी और { सरकार }  से बीमा  { Insurance } करवाया गया व् पत्रकार आवास योजना के लियें संगठन के माध्यम से सरकार से  योजना को पूर्ण करने के लीये प्रयास जारी |

PRSI { PUBLIC RELATION SOSAITY OF INDIA }

पवन देव ने अपनी पत्रकारिता के बाद अपनी मास्टर डिग्री JOURNLISM AND MAAS COMMUNICATION   पब्लिक रिलेशन एंड एडवरटाइजिंग में विशेषज्ञ ”  राजनीतिक जनसंपर्क ( political public relations ) किया है पवन देव  पब्लिक रिलेशन क्षेत्र में कार्य कर रहे है इसके साथ ही इन्होंने जयपुर मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन  {JMRC } में ( जयपुर मेट्रो रेल ) के उद्घाटन के समय बेहतर संवाद  व्यापारियों के साथ स्थापित कर व्यापरियों व् रेल प्रशासन के बीच सेतु का काम किया |

इसके साथ ही पवन देव ने विधानसभा चुनावों से पूर्व ” भारतीय चुनाव अभियानों में सोशल मीडिया की भूमिका “ पर बुद्धिजीवी वर्ग ,सांसद , विधायक, वरिष्ठ पत्रकार , पीएचडी स्कोलर , समाज सेविका महिलाओं व यूथ पर अपना लघु शोध किया ” पूरा किया |

जनसंपर्क के क्षेत्र में कड़ी मेहनत को देखते हुये पब्लिक रिलेशन सोसायटी ऑफ इंडिया के जैसे राष्ट्रीय संगठन के जयपुर चैप्टर में मुख्य सदस्यो में पवन देव को जगह मिली इसके साथ ही गत { prsi } कार्यकरणी चुनावों में पवन देव को चुनाव अधिकारी की विशेष जिम्मेदारी मिली जिसका पवन देव द्वारा सफलता पूर्वक चुनाव करवाया गया  | पवन देव को  इस संगठन में सबसे छोटे सदस्य के रूप में मुख्य सदस्यता मिलने का गौरव मिला है

व्यवसाय –

वर्तमान में आर्थिक आजीविका के लिये पवन देव MEDIA AND PR CONSULTANT का काम कर रहे है इसके साथ ही  https://politico24x7.com/  नामक अपनी न्यूज़ वेबसाइट चला रहे है  साथ ही जल्द ही अपना समाचार पत्र / पत्रिका का संचालन भी जल्द शुरू किया जाना है

PERSONAL INFORMATION

NAME – PAWAN DEV 

FATHER – PURAN MAL

CAST – SC { ANUSUCHIT JAATI } – { KHATIK }

DOB  – 24 JAN 1989

CONTACT- 7688827752 ,7976371944

ADD – R- 202 JIVAN MARG LAXMI NARAYAN PURI  { JAIPUR -302002 }

MAIL – PAWANDEV024@GMAIL.COM

VIDHANSBHA – KISHANPOL – JAIPUR

EDUCATION  – B.A RAJASTHAN UNIVERSITY

 BJMC {  Bachelor of Journalism & Mass Communication } – VMOU KOTA 

MMC – PR  { Master of Mass Communication(PR&A) – HJUJ JAIPUR 

Certificate courses

 Digital marketing – Micro, Small &  Medium Enterprises ( MSME )

 Entrepreneurial Development Program { EDP } – MSME govt of india 

जयपुर के युवा ‘ जो पहली बार वोट करने जा रहे है ‘ क्या सोचते है जाने ख़ास

जयपुर | जयपुर शहर लोकसभा चुनाव प्रचार जैसे – जैसे चरम सीमा पर पहुँच रहा है जयपुर की जनता किसे वोट दे किसे चुने यह एक बड़ा सवाल सामने आता है इसी सवाल को लेकर जयपुर के युवा जो पहली बार वोट करने जा रहे है क्या कहते है  जाने ख़ास –

जयपुर शहर के लोकसभा प्रत्याशीयों में युवाओं की उमीद – बसपा प्रत्याशी पूर्व IAS उमराव सालोदिया से

सकारात्मक   

सर्वे अनुसार –

भाजपा के राम चरण बोहरा –

भाजपा के वर्तमान सांसद व् वर्तमान प्रत्याशी राम चरण बोहरा को लेकर जयपुर की जनता क्या कहती है जाने – 

युवा वर्ग { 18 से 25 } – राम चरण बोहरा ने 5 लाख से अधिक वोटो से जीत हासिल की थी लेकिन जयपुर के युवाओं को रोजगार दिलाने में नाकामयाब रहे , युवा कहते है की प्रधानमंत्री मोदी ने स्टार्ट – अप , मेक इन इंडिया आदी मुख्य योजना लागू की लेकिन जमीन स्तर पर नहीं देखने को मिली  अपने पुरे कार्यकाल में लगभग बोहरा जी सुस्त नज़र आये , अधिकतर समय वह पार्षद , नाराज विधायकों मनाने में लगे रहे, इस बार भी भाजपा ने उन पर दावं चला है लेकिन जनता बदलाव चाहती है – जनता युवा ,पढ़ा लिखा ,सांसद चाहती है जो युवाओं को बेहतर भविष्य के निर्माण में योगदान दे सके | ग्रामीण से भाजपा प्रत्याशी व् सांसद राज्यवर्धन सिंह ने युवाओं को लेकर अच्छा काम किया है वह पुरे कार्यकाल सक्रिय रहे है |

बसपा के – प्रत्याशी पूर्व सीनियर IAS अधिकारी – उमराव सालोदिया –

युवा वर्ग { 18 से 25 } – वर्तमान समय में बसपा पार्टी ने जयपुर शहर में मजबूत प्रत्याशी – आईएस उमराव सालोदिया को टिकट दिया है युवा वर्ग बसपा प्रत्याशी को लेकर सकारात्मक पक्ष रखते हुये कहते है की सालोदिया जी एक ईमानदार छवि के अधिकारी रहे है अगर वह यह चुनाव जीतते है तो देश के सामने जो वर्तमान चुनोतियाँ है उनका तर्क सहित हल ख़ोज सकते है और उनके लम्बे कार्य अनुभव का लाभ जयपुर की जनता को मिलेगा ,वह IAS अधिकारी रहे है और युवा वर्ग की समस्या और उनके बेहतर भविष्य को लेकर अच्छा कार्य कर सकते है

वह शिक्षित व् सिस्टम से अपने अधिकारों के लियें लड़ें है और  ‘संघर्ष किया है जयपुर की जनता ,युवा उन पर भरोसा कर सकता है |

कांग्रेस – प्रत्याशी 

वर्ग { 18 से 25 } – कांग्रेस प्रत्याशी ज्योति खंडेलवाल तेज -तरार नेता है लेकिन उनका मेयर का कार्यकाल विवादित रहा है इस के साथ ही वर्तमान समय में उनका जयपुर के कांग्रेस दिगग्ज नेता ओं से समीकरण नहीं बेठ रहा चाहे कार्यलय उद्घाटन के समय समाचार पत्रों में कांग्रेस की अंत:कलह सामने आ रही है , कांग्रेस पार्टी आपसी मत भेद के कारण सीट निकालने में मुश्किल है |

नोट – यह सर्व युवा वर्ग विशेष उन लोगों पर किया गया है जो पहली बार वोट करने जा रहा है और वह क्यों सोचता है वर्तमान प्रत्याशियों के लियें उस पर आधारित है |

क्या पीएम मोदी और अमित शाह झूठ -जुमलो के सहारे चुनाव जीतना चाह रहे हैं –

Is PM Modi and Amit Shah want to win the elections with the lie

यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय है, जहाँ प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल के मुखिया तथा मुख्यमंत्री स्तर के राजनेता खुलकर चुनावी सभाओं में झूठ बोल रहे हैं, जनता को गुमराह कर रहे हैं, जनहित के मुद्दों से मतदाता का ध्यान हटा रहे हैं, ताकि पूर्व की भांति जनता उनकी लफ्फाजी के चक्रव्यूह में फंस जाए और उन्हें एक बार फिर सत्ता सौंप दे ! 

जयपुर (टीम इकरा पत्रिका)। भारतीय लोकतंत्र को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, क्योंकि यहाँ बहुत से देशों की कुल आबादी से अधिक करीब 90 करोड़ वोटर हैं। जितने किसी एक देश में तो होने का सवाल ही नहीं है। साथ ही यह वोटर पंचायत और नगर निकाय से लेकर विधानसभा एवं लोकसभा तक का हर पांच साल में चुनाव करते हैं। जनता को नीचे से लेकर ऊपर तक के तमाम लोकतांत्रिक राजाओं को बदलने का अधिकार है। भारतीय लोकतंत्र की एक और विचित्र बात भी है कि यहाँ देश के किसी न किसी कौने में हर वर्ष कोई ना कोई चुनाव होता है। यानी यहाँ चुनाव एक लोकतांत्रिक त्यौहार बन चुका है।

यह बड़ी खूबसूरती है भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था की, इसीलिए इसे विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। लेकिन 70 साल बाद इस बेमिसाल लोकतंत्र पर लोकतंत्र के जरिए ही काले बाद मण्डराने लग गए हैं ! आज हमारा लोकतंत्र जातिवाद, धर्मवाद, वंशवाद, पूंजीवाद, अपराधवाद, घोटालेवाद आदि कई वादों के साथ एक और वाद का भी शिकार हो चुका है तथा वो है झूठवाद ! सियासी बहसों और चुनावी भाषणों में हल्की फुल्की झूठ तो बरसों से चल रही है तथा कमोबेश सभी राजनीतिक दल इसका सहारा लेते रहे हैं।लेकिन तर्क वितर्क की जो हत्या और सफेद झूठ का बोलबाला इस चुनाव में हो रहा है, या पिछले पांच साल के विभिन्न चुनावों में हुआ है, वैसा कभी नहीं हुआ है !

यह भी सच है कि कुछ पार्टियों को छोड़ दें, तो झूठवाद के इस सियासी हमाम में बाकी सभी पार्टियां नंगी नज़र आती हैं। लेकिन यह और खतरनाक तब हो जाता है, जब सत्तारूढ़ दल के नेता और यहाँ तक कि स्वयं प्रधानमंत्री खुलेआम चुनावी सभाओं में झूठ बोलने लग जाएं ! सवाल यह है कि कोई आदमी झूठ क्यों बोलता है ? झूठ तीन वजह से बोली जाती है। पहली सच का सामना करने की हिम्मत नहीं हो। दूसरी वजह किसी बात को छुपाना चाह रहा हो, ताकि उसकी पोल न खुल जाए। तीसरी वजह लोगों को गुमराह कर अपना फायदा उठाने की कोशिश में झूठ बोली जाती है। अगर झूठ बोलने से किसी व्यक्ति विशेष का फायदा और नुकसान होता है, तो वो ज्यादा खतरनाक नहीं होता है, लेकिन अगर झूठ बोलने से किसी राष्ट्र या समाज का नुकसान होता है, तो वो झूठ बेहद खतरनाक होती है !

कुछ ऐसा ही आज हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनके खासमखास और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तथा भाजपा के बड़े नेता कर रहे हैं। यह लोग जनहित के मुद्दों पर बात करने की बजाए ऐसे मुद्दों पर बात कर रहे हैं, जिनसे लोकतंत्र कमजोर हो तथा इनकी झूठी बातों से मतदाता गुमराह होकर इन्हें पुनः सत्ता सौंप दे। जनता ने इन्हें पांच साल पहले पूर्ण बहुमत की सरकार सौंपी थी, क्योंकि जनता कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के काले कारनामों से दुखी थी। जनता ने सोचा कि सत्ता बदलनी चाहिए और नरेन्द्र मोदी एवं उनकी टीम को मौका देना चाहिए। क्योंकि इन्होंने अच्छे दिन लाने, विकास, रोजगार आदि लाने का वादा किया था। अब पांच बाद चुनावों में इन्हें यह बताना चाहिए कि हमने विकास कौनसा और कहाँ कहाँ किया तथा रोजगार कितनों को दिया ? लेकिन इन मुद्दों पर यह बात नहीं करते, क्योंकि इन्होंने इन मुद्दों पर पांच साल में कुछ किया ही नहीं।

पांच साल में जिस भी राज्य में विधानसभा चुनाव हुए हैं, घुमा फिराकर यह लोग कश्मीर, पाकिस्तान, मुसलमान, हिन्दू, मदरसे, कब्रिस्तान, शमशान, गौ हत्या, लव जिहाद, जिन्नाह, धर्मान्त्रण, घर वापसी, तीन तलाक, राम मन्दिर, बाबरी मस्जिद, मुस्लिम तुष्टीकरण, हिन्दुओं को खतरा, हिन्दुओं का पलायन, बांग्लादेशी घुसपैठिये, रोहिंग्या जैसे मुद्दों को अपना चुनावी मुद्दा बनाते आ रहे हैं। हाँ, इन मुद्दों में भी यह उच्च स्तर का चयन करते हैं, जिस राज्य में जो फ़िट बैठ रहा हो, उसे पूरी ताकत से उठाते हैं और जो वहाँ फायदेमंद नहीं हो, उस मुद्दे को छोड़ देते हैं। यह लोग रोटी, रोजगार, खेती किसानी, शिक्षा, चिकित्सा आदि जनहित के मुद्दों पर कोई बात नहीं करते, अगर कहीं मजबूरी में करते भी हैं तो घुमा फिराकर फर्जी आंकड़ों व लफ्फाजी का सहारा लेकर करते हैं।

गत दिनों प्रधानमन्त्री ने वर्धा की एक चुनावी रैली में कहा कि हिन्दू आतंकवाद शब्द कांग्रेस की देन है। अब यह बात समझ से परे है कि कांग्रेस ने कब कहा था कि हिन्दू आतंकवादी होते हैं ? अगर कांग्रेस ने ऐसा कहा है तो उसके खिलाफ उसी वक्त मुकदमा दर्ज होना चाहिए था। उन्होंने यह बात विभिन्न बम धमाकों में साध्वी प्रज्ञा और असीमानंद मामले को लेकर कही। लेकिन प्रधानमंत्री जी को मालूम होना चाहिए कि जिस तत्कालीन गृह सचिव आर के सिंह ने इन मामलों को उजागर करवाया या किसी बेगुनाह हिन्दू भाई को आतंकवाद के मुकदमे में फंसवाया, वे भाजपा के सांसद और आपके मन्त्रीमण्डल के सदस्य हैं ! आपने आज तक आर के सिंह पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की ? इसी तरह से एक अप्रेल को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ओडिशा की चुनावी सभा में कहा कि कांग्रेस

हिन्दुओं पर आतंकवादी होने का ठप्पा लगाकर उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रही है।

7 अप्रेल को कूच बिहार की एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री ने कहा बंगाल विकास से वंचित रहा है। ममता बनर्जी राष्ट्र विरोधी लोगों का समर्थन करती हैं। अगर यह बात सही है तो प्रधानमन्त्री जी आप पांच साल क्या कर रहे थे ? जनता ने देश की चाबी आपको सौंप रखी थी, आपको बंगाल सरकार को बरखास्त कर ममता बनर्जी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करना चाहिए था और फिर बंगाल में विकास की गंगा बहानी चाहिए थी। साथ ही प्रधानमन्त्री जी को यह भी बता देना चाहिए जिन प्रदेशों में भाजपा का राज है, वहाँ कितना विकास हुआ है ? हकीकत तो यह है प्रधानमंत्री जी कि जिस तरह से बंगाल में आम आदमी बुनियादी समस्याओं को लेकर त्राहि त्राहि कर रहा है, उसी तरह से भाजपा शासित राज्यों में भी त्राहि त्राहि मची हुई है !

मोदी जी ने 6 अप्रेल को सोनपुर की एक सभा में कहा कि गरीबी हटाने के लिए सबसे बेहतर जड़ी बूटी है, जिसका नाम है कांग्रेस हटाओ ! इसी दिन उन्होंने नांदेड़ में कहा कि कांग्रेस जनता से किए वादे भूल जाती है ! मोदी जी कांग्रेस को हटाए तो पांच साल हो गए ? फिर आपने इस जड़ी बूटी से जनता की गरीबी दूर क्यों नहीं की ? रही वादों की बात, तो यह सच है कि कांग्रेस अपने वादों को भूल जाती है। लेकिन आपको यह बात कहते शोभा नहीं देती, क्योंकि आपने भी ऐसा ही किया है। यानी आपने जो वादे 2014 के चुनाव में किए थे उनमें से एक भी पूरा नहीं किया !

इसी तरह प्रधानमन्त्री ने 5 अप्रेल को देहरादून में कहा कि अगस्ता हेलिकॉप्टर घोटाले में एपी और फेम दो नाम गिरफ़्तार दलाल मिशेल ने बताए हैं। एपी का मतलब अहमद पटेल और फेम का मतलब फैमिली ! यानी सोनिया गांधी का परिवार। मोदी जी अगर यह सच है तो आपने आज तक एपी और फेम को सलाखों के पीछे क्यों नहीं भेजा ? क्या यह आपकी देश से गद्दारी नहीं है ? क्योंकि जनता ने देश का मुखिया आपको बनाया और आपको यह मालूम है कि एपी और फेम चोर हैं, तो आपके द्वारा उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न करना एक तरह से देश को धोखा देना और चोरों को बचाना है ! क्या जनता यह समझे कि आपने एपी और फेम को बचाने के लिए कोई बड़ा सौदा किया है ?

ऐसे बेशुमार झूठ प्रधानमन्त्री और उनकी पार्टी के बड़े नेता चुनावी सभाओं में बोल रहे हैं। क्योंकि इनसे आसानी से जनता का ध्यान जनहित के मुद्दों से हट जाता है। क्या प्रधानमन्त्री जी को यह नहीं बताना चाहिए कि कितने लोगों को रोजगार मिला ? कालाधन कितना आया और उसका वितरण 15 लाख या उससे कम किस किस के खाते में हुआ ? कितने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई ? इनमें भाजपा के कितने नेता शामिल हैं ? अगर जिनके खिलाफ कार्रवाई हुई है, उनमें एक भी भाजपाई नेता नहीं है, तो क्या भाजपा के किसी भी नेता ने आज तक कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है ? चलिए यह तो कुछ कठिन सवाल हैं, सिर्फ इस सवाल का जवाब दे देना चाहिए कि पांच साल में केन्द्रीय सेवाओं में कुल कितनी भर्तियां हुई और आज कुल कितने पद खाली पड़े हैं ? दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा !

लेख़क -एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।

लोकसभा – नाकारा, निकम्मा और खुदगर्ज़ विपक्ष क्या खाक मोदी को हटाएगा – जानें ख़ास

Disappointing, unsafe and self-destructive opposition will remove Modi from Modi –

आज हर विपक्षी पार्टी प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाने की बात कर रही है, लेकिन उनका बिखराव और एक एक सीट के लिए खींचतान तथा बिना साझा घोषणा पत्र के चुनावी मैदान में उतरना यह साबित करता है कि उन्हें न देश की चिंता है और ना ही जनहित की। वे तो सत्ता के गुलाम हैं और खुद की सत्ता को ही देशहित एवं लोकतंत्र की रक्षा मानते हैं। ऐसे विपक्ष से कैसे उम्मीद की जाए कि वो मोदी को सत्ता से हटा देगा ?

जयपुर । लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई है और विपक्षी पार्टियां मोदी हटाओ देश बचाओ का नारा लगा रही हैं। लेकिन विपक्षी पार्टियों के बिखराव और बहुत से राज्यों में एक दूसरे के खिलाफ ही चुनाव लङने की घोषणा से इस नारे की हवा निकल चुकी है। विपक्षी नेताओं की एक एक सीट के लिए खींचतान और खुदगर्ज़ी को देखकर लगता है कि इन्हें किसी से कोई मतलब नहीं है। यह इतने खुदगर्ज़, नाकारा और निकम्मे हैं कि खुद की सत्ता ही इन्हें जनहित नजर आती है। यह सच है कि देश की जनता वर्तमान सरकार से दुखी हो चुकी है और वो सत्ता परिवर्तन करना चाहती है, लेकिन वो हताश है, क्यों

सा -आभार

कि उसे मजबूत और जनहित की बात करने वाला विपक्ष दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा है।

 

बात 2014 के आम चुनाव से शुरू करें। इस चुनाव में भाजपा को 31 फीसदी वोट मिला और 282 सीटों का ऐतिहासिक बहुमत भी मिला। भाजपा ने इसे मोदी लहर कहा। लेकिन मैं इसे मोदी लहर की बजाए तत्कालीन यूपीए सरकार की नाकामी और विपक्षी एकता के बिखराव का परिणाम मानता हूँ। भाजपा के खिलाफ करीब 69 फीसदी वोट पोल हुआ था। लेकिन वो टुकड़ों में बंट गया और विपक्षी पार्टियों की सियासी सिर फुटव्वल के कारण भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला तथा नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमन्त्री बने। पांच साल बाद अगर देखें तो विपक्ष वैसे ही जूतम पैजार है, जैसे 2014 के चुनाव में था। विपक्ष के पास न कोई ऐसा एक चेहरा है, जिसको सब अपना नेता मान लें और ना ही कोई जनहित को लेकर संयुक्त घोषणा पत्र है, जिसे पढ कर जनता प्रभावित हो जाए।

बात 1977 के आम चुनाव की कर लें, तो अच्छी तरह से समझ में आ जाएगी। तब देश से इमरजेन्सी हटी थी और आम चुनाव हो रहे थे। एक तरफ कांग्रेसी नारा लगा रहे थे कि इन्दिरा इज इंडिया, इंडिया इज इन्दिरा। तो दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियां इन्दिरा हटाओ देश बचाओ का नारा लगा रही थीं। तत्कालीन विपक्षी नेताओं ने सभी पार्टियों को एकजुट किया और उनका विलय करने के बाद जनता पार्टी बनाई। जनता पार्टी के झण्डे तले सम्पूर्ण देश लामबन्द हो गया और तानाशाह इन्दिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ दिया। यहाँ तक कि रायबरेली लोकसभा सीट से स्वयं प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी भी चुनाव हार गईं और यहाँ से गरीबों के मसीहा समाजवादी नेता राज नारायण चुनाव जीत गए। यह तब हुआ जब सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट हुआ।

अब न वैसे फकीरी मिजाज विपक्षी नेता हैं और ना ही कोई रणनीतिकार। अब तो अवसरवादियों का जमावड़ा है। वर्तमान विपक्षी नेताओं से एक पार्टी बनाने की बात करना तो बेमानी है, यह इतने खुदगर्ज़ हैं कि एक गठबंधन भी नहीं बना सकते। पांच साल तक इन विपक्षी नेताओं ने क्या किया ? बस इस बात का इन्तजार किया कि मोदी सरकार फैल हो जाएगी, तो जनता हमारे सिर सत्ता का सेहरा बांध देगी। इनमें ज्यादातर नेता आला दर्जे के भ्रष्टाचारी और घोटालेबाज हैं। वे खुद की सत्ता और परिवार के अलावा कुछ सोचते ही नहीं। बहुत बुरा जुमला इस्तेमाल कर रहा हूँ, लेकिन क्या करूँ विपक्षी नेताओं की कारस्तानी देख कर यह जुमला लिखने के लिए मजबूर हूँ। हमारे ज्यादातर विपक्षी नेता नाकारा, निकम्मे, चोर और धोखेबाज हैं। इनको जनहित, देशहित और लोकतंत्र की रक्षा से कोई मतलब नहीं है, इनको सिर्फ और सिर्फ खुद की सत्ता से मतलब है, जिसकी रक्षा करने में इन्होंने एङी चोटी का जोर लगा रखा है !

यूपी सबसे बङा राज्य जहाँ बसपा, सपा और आरएलडी का गठबंधन है तथा कांग्रेस इस गठबंधन के सामने दूसरा गठबंधन बना कर चुनाव मैदान में है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी एकला चलो रे की नीति पर चल रही है तथा कांग्रेस व कामरेड यहाँ अलग से मैदान में हैं। बिहार जहाँ गठबंधन तो आखरी वक्त में बन गया, लेकिन सीपीआई को गठबंधन में शामिल नहीं किया। क्योंकि कांग्रेस और आरजेडी के नेता सीपीआई के कन्हैया कुमार को बेगूसराय सीट नहीं देना चाह रहे थे। इन्हें इस बात का डर सता रहा है कि कन्हैया जैसा बेबाक़ युवा लोकसभा में पहुंच गया, तो फिर हमारा भविष्य क्या होगा ? असम में कांग्रेस मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करना चाह रही है, क्योंकि किसी मुस्लिम नेता को क्यों ताकतवर बनाया जाए। दिल्ली में कांग्रेस अरविंद केजरीवाल को साथ नहीं लेना चाह रही है। केजरीवाल दिल्ली गठबंधन के साथ हरियाणा और पंजाब में भी सीट मांग रहे हैं।

इसी तरह महाराष्ट्र का हाल है। यहाँ कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी का गठबंधन है तथा यह गठबंधन प्रकाश अम्बेडकर और असदुद्दीन औवेसी को साथ नहीं लेना चाह रहा है। प्रकाश अम्बेडकर संविधान निर्माता बाबा साहेब डाॅक्टर भीमराव अम्बेडकर के पोते हैं तथा इनकी पार्टी और ओवैसी की पार्टी का गठबंधन हो चुका है। मतलब सीधा सा है कि चाहे महाराष्ट्र में हार जाएं, लेकिन एक दलित और एक मुस्लिम नेता से गठबंधन नहीं करना है। राजस्थान में हनुमान बेनीवाल की पार्टी और आदिवासी पार्टी बीटीपी से गठबंधन नहीं करना है। ओडिशा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक और कांग्रेस आमने सामने हैं। तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश का भी कोई अच्छा हाल नहीं है। यानी विपक्ष अधिकतर राज्यों में बिखरा हुआ है और एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रहा है। दूसरी तरफ भाजपा ने अपना गठबंधन मजबूत बना लिया है। कहीं तो भाजपा सहयोगी दलों के सामने पूरी तरह से झुक गई है। उसने बिहार में अपनी जीती हुई सीटें भी छोड़ दी हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना को बढ़ा कर सीट दी हैं।

ऐसी स्थिति में विपक्षी पार्टियां क्या खाक मोदी को हटाएंगी ? यह सच है कि जनता मोदी राज से नाक नाक आ चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की जन विरोधी नीतियों तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था को तहस नहस करने कोशिश से जनता जबरदस्त नाराज़ है। जनता इस राज को उखाड़ना चाहती है, लेकिन जनता क्या करे ? वो विपक्षी पार्टियों की सिर फुटव्वल और आमने सामने चुनाव लङने की वजह से हताश होती जा रही है। जनता की यह हताशा विपक्षी नेताओं पर भारी पङेगी तथा यह हताशा पोलिंग में रूकावट बनेगी और कम पोलिंग व वोटों के बिखराव से सीधा लाभ भाजपा को होगा ! जिससे विपक्षी नेताओं के प्रधानमन्त्री बनने के सपने पर पूरी तरह से पानी फिर जाएगा। विपक्षी नेताओं को यह बात अच्छी तरह से याद कर लेनी चाहिए कि तुम्हारी इस खुदगर्ज़ी को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा !

लेख़क – एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।