हाँ मोदी जी में भीं आंदोलनकारी हूँ जो आप की आखों में खटक रहा हूँ लेकिन में अन्नदाता किसान हूँ परजीवी नहीं

मोदी जी के प्रिय गैर संवेधानिक संगठन RSS के प्रचारक हैं असली परजीवी –  प्यारेलाल ‘ शकुन ‘

 

 

आंदोलन जीवी – एक नयी जमात

पी एम नरेंद्र मोदी ने 8 फरवरी 2021 को राज्य सभा में ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ पर चर्चा के दौरान संकेतों- संकेतों में अपनी समस्याओं के समाधान हेतु सरकार का ध्यान आकर्षित करने वाले किसान आंदोलनकारी नेताओं को श्रम जीवी, बुद्धि जीवी के साथ तुकबंदी करते हुए ‘आंदोलनजीवी’ परजीवी(अर्थात जो आंदोलन पर ही जीवित रहते हैं) कहकर उनके प्रति अपने नफरत भरे दृष्टिकोण को प्रकट कर दिया और उनका उपहास किया है। इससे प्रतीत होता है कि मोदी जी को ये आंदोलन करने वाले खासकर किसान वामपंथी नेता फूटी आँखों नहीं सुहा रहे हैं बल्कि मोदी सरकार की आँख की किरकिरी बन गये हैं क्यों न बने उनके रास्ते की बाधा जो बन गये हैं, ये ‘आंदोलन जीवी’।

 

इन आंदोलन जीवियों ने मोदी सरकार को कोर्पोरेट्स के कटघरे में खड़ा कर दिया है। और इसे लेकर उनकी खुद की पार्टी में सवाल उठने लगे हैं। इसके अलावा ऐसे कुछ नेताओं ने खुले आम संसद में किसानों का पक्ष लिया है और विरोधियों को देशद्रोही कहकर उन्हें जेल में डाल देने, उनके खिलाफ CBI, ED आदि का इस्तैमाल करने पर सवाल खड़े किये हैं। सांसद विद्या ठाकुर ने संसद में कहा है कि देश के टुकड़े टुकड़े मत करो, आप क्या जाने अहिंसा, आपने तो लाठी चलाना सिखाया है? वाजपेयी जब विरोध करते थे तो कभी नेहरू ने उन्हें देशद्रोही नहीं कहा, कम्युनिस्ट पार्टी को चार साल के लिए बेन कर दिया परंतु नेहरू ने उन्हें देशद्रोही नहीं कहा। परंतु इस लोकतंत्र में आपकी सरकार की या आपकी कोई आलोचना करे तो उस पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है, क्यों? उनके खिलाफ cbi, Ed आदि का इस्तैमाल किया जाता है। हम उस राम का मंदिर बना रहे हैं जिसने अपनी धर्म पत्नी सीता की दो बार अग्नि परीक्षा ली और गर्भवती सीता को जंगल में अकेले छोड़ दिया गया। इस तरह एक नारी का अपमान करने वाले राम को भगवान कहकर उसका मंदिर बनाया जा रहा है। आप मंदिर बनाइये परंतु इस देश के संविधान की धर्मनिरपेक्ष गरिमा को नीचे मत गिराइये।

 

 

आज इन्ही आंदोलन जीवी नेताओं ने साबित कर दिया है कि देश को कोर्पोरेट्स नहीं चलाते बल्कि देश के किसान मजदूर चलाते हैं। किसान यह समझ चुका है कि आपने जो ये तीन किसान विरोधी कानून बनाये हैं ये उसे आजादी के पहले की गुलामी में पहुंचा देंगे। इस देश को जब आजाद कराया था तब भी इन आंदोलन जीवियों ने अपने सीने पर गोलियां खाईं थी और फांसी पर चढ़े थे। परंतु तब भी आपके संघी देश भक्त अंग्रेजों का साथ दे रहे थे और देश की जनता को हिंदू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र में बाँट कर देश के राष्ट्रीय आंदोलन में फूट पैदा कर रहे थे। आपने राम के नाम का इस्तेमाल राजगद्दी हासिल करने के लिए किया है, भले ही देश को 1989,1990,1992 और 02002 के ऐतिहासिक सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंक दिया हो। क्या इसके लिए आंदोलन जीवी जिम्मेदार हैं ? ‘या सांप्रदायिक सिद्धांतजीवी।

 

और एक बात यह है कि देश के प्रधान सेवक जी कि जिसे आप नयी जमात कहकर व्यंग कर रहे हैं, वह नयी नहीं है बल्कि पुरानी जमात है। सुभाष चन्द्र बोस भी आंदोलनजीवी ही थे, देश की माता बहनो ने अपने गहने उतार कर उनके आंदोलन के लिए समर्पित कर दिये थे। भगतसिंह, चंद्र शेखर आजाद, रामप्रसाद बिश्मिल और अस्फाक उल्ला खां भी इसी धारा के आंदोलन जीवी थे जो देश के लिए अपना सर्वश्व न्यौछावर करके चले गए।

लेखक – प्यारेलाल ‘ शकुन ‘

आप शायद इतिहास में रुचि नहीं रखते हैं। परंतु मैं आपको एक बहुत महत्वपूर्ण जानकारी से अवगत कराना चाहता हूँ जो यह है कि इस देश में ये आंदोलन जीवी कोई नये नहीं है। भारत में सबसे पहला किसान आंदोलन खड़ा करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है।
दंडी सन्यासी होने के बावजूद सहजानंद ने रोटी को भगवान कहा था और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया था। उन्होंने किसानों को लेकर

नारा दिया था:
जो अन्न वस्त्र उपजायेगा,
अब सो कानून बनायेगा।
ये भारतवर्ष उसी का है,
अब शासन वही चलायेगा “

परंतु हम देख रहे हैं कि भारत अंग्रेजी हुकूमत से आजाद तो हुआ लेकिन किसानों और मजदूरों को अभी भी अपने हक में कानून बनाने का अधिकार नहीं मिल सका है बल्कि उन्हें जो अधिकार पहले मिले थे उन्ही को वर्तमान पूंजीवाद उन से छीन रहा है।
1934 में बिहार में प्रलयंकारी भूकंप आया था जिससे सब कुछ तबाह हो गया। तब स्वामी जी ने राहत और पुनर्वास के काम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। उन्होंने किसानों को हक दिलाने के संघर्ष को अपना लक्ष मान लिया था जिसके बाद उन्होंने नारा दिया था:

” कैसे लोगे मालगुजारी ,
             लट्ठ हमारा ज़िंदावाद “

बाद में यही नारा किसान आंदोलन का सबसे प्रिय नारा बन गया। वे कहते थे:

अधिकार हम लड़ कर लेंगे, जमींदारी का खात्मा करके रहेंगे।

परंतु जमींदारी अब नहीं रही, अब पूंजीवाद है और इसीलिए कोर्पोरेट्स के हित में ये कानून बनाये गए हैं। आंदोलन के दबाव में यदि ये कानून वापिस भी ले लिए गए तो भी सरकार फिर से हेर फेर करके इन्हें वापिस ले आयेगी। इसलिए किसानों का नारा भी अब ये हो जायेगा:

“अधिकार हम लड़ कर लेंगे,
पूंजीवाद का खात्मा करके रहेंगे “

इसलिए मोदी जी हम आंदोलन जीवी नहीं है बल्कि आंदोलन धर्मी हैं। और न हम पर जीवी हैं बल्कि हम मेहनतकश वर्ग के सृजनशील इंसान हैं।
इसलिए हमारा नया नारा है:

 

” जब जब जुल्मी जुल्म करेगा,   सत्ता के गलियारों से   पत्ता पत्ता गूंज उठेगा,  इंकलाव के नारों से  “

 

  लेखक –  प्यारेलाल ‘ शकुन ‘

 

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